आतंकवादी से ज्यादा खतरनाक है आतंकी विचार | आतंकवादी व्यक्ति की हत्या करते हैं जबकि आतंकी विचार मानवीय प्रेम एवं विश्वास को कलंकित करता है| आतंकवादी से लडाई प्रत्यक्ष है जबकि आतंकी विचार अप्रत्यक्ष रूप से कट्टरता के द्वारा अपने पीछे विचारधारात्मक हुजूम इक्कठा कर लेता है और यही कट्टरता आजकल हर कहीं सहज सोच एवं सकारात्मकता पर किसी न किसी रूप में हावी है|
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Tuesday, 30 December 2014
Saturday, 27 December 2014
Wednesday, 24 December 2014
रहम की भीख
रहम की भीख मांगने वाले बकरे जल्दी काट दिए जाते हैं ताकि दूसरे बकरे बगावत न कर बैठें एवं अपनी गर्दन बिना किसी जोर जबरदस्ती के कटने हेतु टिकाए रखें|
तुम किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी?
कई बार सम्मान अपनी सार्थकता खो बैठता है| अटल बिहारी बाजपेयी जी को यह सम्मान अगर बीमार होने से पहले मिलता तो उनके लिए सार्थक था| ऐसे ही अन्य महापुरुषों को यह सम्मान उनके जीते जी मिलता तो उनके लिए गौरव की बात होती| अक्सर देखा जाता है व्यक्ति तो गुमनामी में मर जाता है पर बाद में वह सम्मान का हक़दार हो जाता है या उसके नाम पर ही सम्मान चल पड़ता है| यह ऐसे ही है जैसे मीडिया के कुछ लोग बाढ़ में डूब रहे लोगों से पूछते हैं कि कैसा लग रहा है? शायद इसलिए भी भारतीय राजनीति में दो परंपराएँ चल पड़ी है एक खुद ही स्मारक बनाने की; दूसरी अपने लोगों को स्वयं ही महिमामंडित करने की,चाहे उसकी जन स्वीकार्यता हो या नहीं क्या फर्क पड़ता है? किंतु कुछ ऐसे भी ज्ञानी हैं जिन्हें कहीं से सम्मान मिल जाए तुरंत ले लें परंतु बड़े से बड़े लोगों के सम्मान पर भी ऊँगली उठाने से परहेज नहीं करते| सम्मान मिलने से ज्यादा महत्वपूर्ण है यह देखना कि सम्मान देने की पीछे की भावना क्या है? पर यह देखने की फुर्सत किसे है? यहाँ तो लोगों को एक ही गम है-- तुम किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी?
Thursday, 18 December 2014
हिंसा
सामाजिक असमानता एवं धर्मान्धता हिंसा की मुख्य वजह है जो नीच राजनीतिक व क्षुद्र स्वार्थ कारणों से और भी घृणित एवं वीभत्स हो सम्पूर्ण मानवता को कलंकित एवं शर्मसार कर रही है|
Saturday, 13 December 2014
आत्म धर्म
जैसे ही आप किसी दल,संगठन,संस्थान आदि की सीमाओं से बंधते हैं: आप उस दल, संगठन, संस्थान के पिंजड़े का तोता बन जाते हैं| सही को सही और गलत को गलत कहने की आपकी विवेकशीलता पर उस दल,संगठन,संस्थान का शिकंजा इतना कसा होता है कि आप पिंजड़ा धर्म निभाने के लिए हर गलत काम को न्यायोचित सिद्ध करने में अपनी नैसर्गिक प्रतिभा का हनन करने लगते हैं एवं उस दल,संगठन,संस्थान को बनाने में खुद अपना नैतिक पतन कर लेते हैं और वही दल,संगठन,संस्थान कई बार आपको मक्खी की तरह निकालकर बाहर भी फेंक देता है| ऐसे में आत्म धर्म ही आपका संबल बनता है|
Wednesday, 10 December 2014
मलाला का नोबेल
यह देखना दिलचस्प होगा कि नोबल पुरुस्कार प्राप्त करते समय मलाला के शिक्षा अधिकार एवं आतंकविरोधी बयान को पाकिस्तान किस तरह पढ़ता है| ऐसे समय में जब पाकिस्तान पहचान की संकट से गुजर रहा हो मलाला उसके लिए गर्व बनकर सामने आई है,परंतु पाकिस्तान की राजनीति व आतंकवाद पर मलाला का यह सम्मान कितना भारी पड़ेगा यह वक्त ही बताएगा|
Monday, 8 December 2014
बलात्कार
बलात्कार की घटना को पुरुष बनाम स्त्री एवं पीड़ित बनाम दोषी तक सीमित कर देना अदूरदर्शिता की निशानी है| प्रतीकों,प्रदर्शनों एवं मीडिया को केंद्र में लाकर एकाध लड़ाई लड़ी जा सकती है,परंतु व्यवस्था परिवर्तन के लिए नागरिक,सत्ता तंत्र,न्याय तंत्र की जिम्मेदारी तय करने के साथ स्त्री-पुरुष समानता के अधिकार सहित ऐसे माहौल के निर्माण करने की जरुरत है जहाँ गलत करने के प्रति भय दंड की अनुभूति हो|
Thursday, 4 December 2014
भाषा की कठोरता का सवाल
वर्तमान समय-समाज में व्यक्ति पर सामाजिक विडंबनाओं व प्रतिस्पर्धा का इस कदर मानसिक दबाव है कि व्यक्ति के मन की भाषा और स्वार्थ की भाषा में भारी अंतर आ गया है जिसके कारण अधिकांश राजनीतिज्ञ,बुद्धिजीवी,प्रशासक,बाबा सभी दोहरे चरित्र का शिकार हो गए हैं| भाषा की कठोरता स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व के कठोरता की ही उपज है जो दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति को भी रेखांकित करती है| ऐसे में जीवन को सुगम व चिंतन को सकारात्मक बनाने की जरुरत है क्योंकि अहम,दुर्भावना से जुड़ी भाषा हिंसक भाषा में तब्दील हो असभ्य समाज का निर्माण कर रही है,जिसका परिणाम अंततः विनाशकारी है|
Thursday, 13 November 2014
रंग रसिया
'रंग रसिया' कला एवं धर्म के टकराव पर आधारित अपने वक्त को रेखांकित करती एक बेहतरीन फिल्म कही जा सकती है जो देखने का एक नया नजरिया पैदा करती है|
Thursday, 23 October 2014
Sunday, 19 October 2014
Sunday, 12 October 2014
'हैदर'
'हैदर' फिल्म के केंद्रबिंदु में 'पिता का इंतकाम' है जो आतंकवाद में तब्दील हो जाता है| आतंकवादी की मानवीयता के आधार पर इलाज करने वाले हैदर के पिता की गुमशुदगी की वजह भारतीय सेना को बताया गया है| भारतीय सेना की यंत्रणा से आतंकवाद को पनपते हुए दिखाया गया है| पूरे फिल्म में भारतीय सेना कश्मीर में ज्यादती करते दिखाई गई है| वहीँ अंत में फिल्म की शूटिंग के लिए भारतीय सेना को ही धन्यवाद दिया गया है| एक आम मुस्लिम की छवि आजाद कश्मीर के रूप में पेश की गई है| हैदर द्वारा अपने माँ के चरित्र पर लांछन लगाते दिखाया गया है| फिल्म के निर्देशक विशाल भारद्वाज फिल्म की कथावस्तु को तार्किक आधार नहीं दे पाए हैं | सनसनीखेज घटनाओं के समुच्चय द्वारा 'हैदर' फिल्म दहशतगर्द लोगों के लिए एक मनोरंजक फिल्म बन गई है जो मानवीयता का माखौल उड़ाते दिखती है|
Friday, 10 October 2014
उजाले की मंजिल
बाल श्रम उन्मूलन जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मुद्दे के लिए श्री कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलना गर्व का विषय है वहीँ उनके योगदानों को अपने ही देश की सरकार द्वारा उपेक्षित किया जाना यह रेखांकित करता है कि देश में सत्यनिष्ठा, कर्मशीलता अथार्त कर्म से गाँधीवादी होने का मूल्य क्या है? सचमुच भारत के राजनीतिज्ञों के लिए शर्म का विषय है कि वह एक उजाले को भी अँधेरे में दबाए रहे जबकि उजाले ने अपनी मंजिल खुद ही तय कर ली|
Thursday, 9 October 2014
कश्मीर की जनता
प्रकृति की मार झेल चुके कश्मीर की जनता पर पाकिस्तान की अस्थिर सरकार द्वारा की जा रही निरंतर गोलाबारी यह साबित करती है कि पाकिस्तान अपनी जर्जर अर्थव्यवस्था एवं बुरे हालात से अपने आवाम का ध्यान हटाने के लिए कश्मीर की भावनाओं को भड़काकर अपनी जनता को गुमराह करता है और भारत के प्रति प्रतिशोध की भावना के जरिए भारत विरोधी देशों से राजनीतिक कामयाबी हासिल करता है|
Tuesday, 7 October 2014
बेगुनाह लोगों की जान
जब प्रशासनिक चूक एवं राजनीतिक नाकामी से बेगुनाह लोगों की जान चली जाती है और दुर्घटना की जांच व कार्रवाई दस्तावेजों में दफ़न हो जाती है| ऐसे में जब सियासत मोमबत्ती जलाकर एवं मुआवजा की घोषणा कर अपनी पीठ थपथपाता है तो मन सिहर जाता है| जिन लोगों पर बेगुनाहों की जान लेने का मुक़दमा चलना चाहिए वे ही मौत का सौदा करते हैं और बड़े फक्र से बेमौत की कीमत 3 लाख लगाकर जनता का मजाक उड़ाते हैं| अगर कोई वकील मित्र सर्वोच्च न्यायालय में पी आई एल डालकर भारत / राज्य सरकार से अब तक गठित जांच समितियों एवं उस पर हुई कार्रवाई के संबंध में कोई ठोस पहल कर सकें तो इसका दूरगामी असर हो सकता है|
पद की गरिमा
राष्ट्रपति की तरह प्रधानमंत्री एवं मंत्री मंडल का दायित्व भी दलगत राजनीति एवं विचारधारा से ऊपर उठकर पूरे देश को एक साथ लेकर चलने के लिए होना चाहिए और इसी आशय का शपथ सांविधानिक पद पर बैठे नेता गण लेते भी हैं| फिर चुनाव प्रचार के समय प्रधानमंत्री, मंत्री गण एवं सांविधानिक पद पर बैठे नेता गण अपने दल के प्रचार हेतु विरोधियों की ऐसी आलोचना करते हैं कि उनके मन की घृणा साफ़ दिखने लगती है एवं सौहार्द पूर्ण माहौल दूषित होने लगता है; प्रधानमंत्री, मंत्री गण एवं सांविधानिक पद की गरिमा गिरने लगती है| काश ऐसा हो सके कि सांविधानिक पद पर बैठे व्यक्ति अपने पद की गरिमा बचाने के लिए तात्कालिक लोभ से स्वयं को मुक्त कर सकें तो स्वच्छ छवि का निर्माण हो एवं राजनीति के प्रति आमलोगों में सकारात्मक धारणा बन सके|
Saturday, 27 September 2014
हिंदी को पहचान
वातावरण बदलना ही महत्वपूर्ण है| प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय फलक पर हिंदी को पहचान दिलाकर अचानक ही खोई हुई अस्मिता को नई संजीवनी दी है और इस अस्मिता में अंग्रेजी के प्रति घृणा नहीं बल्कि हिंदी के प्रति स्वाभाविक प्रेम है,जो निश्चय ही फलीभूत होगा,ऐसा मेरा विश्वास है|
Sunday, 21 September 2014
लेखन
लेखन जब पुरस्कार, आलोचक व गुटबंदी के इर्दगिर्द केंद्रित हो जाता है तब अपनी सार्थकता खो बैठता है|
Monday, 15 September 2014
स्मृति की भाषा
आजादी से लेकर अब तक हिंदी के बारे में अधिकांश शीर्ष स्तर के सरकारी, राजनीतिक, बुद्धिजीवी, जिम्मेदार व प्रभावशाली लोगों के वक्तव्य व संदेश का मूल भाव समय-समाज के तर्क एवं यथार्थ से दूर हिंदी के दिवास्वप्न से जुड़ी आशा एवं हिंदी भाषा के पारंपरिक भावना से प्रेरित है| शायद इसलिए भी हिंदी सशक्त होने के बावजूद साजिश के तहत याचना की भाषा एवं वर्ष में एक बार स्मृति की भाषा में तब्दील होती जा रही है,जो कि गहरी चिंता व विमर्श का विषय है|
Wednesday, 3 September 2014
Thursday, 14 August 2014
चाय वाले की हैसियत व रुतबा
ऐसे समय में जब राजनीतिक अपच के शिकार एकांगी विचारधारा के लोग उजाले में भी अँधेरे तलाशने के आदि हो गए हों और पिछली सरकार की खामियों को भूलकर नई सरकार के माथे सी सबकुछ मढने को आतुर हों| उनके लिए प्रधानमंत्री जी का साहस व संकल्प भरा मौखिक संदेश बेचैनी पैदा करने वाला है | शब्द लिखे हों या मौखिक असर पैदा करते हैं बशर्ते उस शब्द के पीछे का चेहरा आस पैदा करता हो और काफी समय बाद आज लालकिला अपने रंग में दिखा| मुझे पूरा विश्वास है दुनिया में इस कदम का सकारात्मक प्रभाव जाएगा और प्रधानमंत्री जी के कहे को सरकार सच साबित कर पाई तो अगला 15 अगस्त नई उपलब्धियों से गौरवान्वित हो सकता है| चाय वाले की हैसियत व रुतबा आक्सफोर्ड से बढ़कर भी दिखी|
Tuesday, 12 August 2014
राजनीतिक प्रसव पीड़ा
किसी भी देश की राजनीतिक प्रसव पीड़ा नए युग का आगाज हो सकती है जो दृष्टिहीनता की वजह से प्रजातांत्रिक गर्भपात का शिकार हो जाती है|
Sunday, 10 August 2014
जीवन
जीवन की नदी में जब विवेक - बुद्धि के पतवार से मन व विचार की नाव खेवी जाती है तब प्रतिकूल धाराओं में भी चलना सहज लगता है अन्यथा जीवन समय की धारा की कठपुतली बन कर रह जाता है|
भ्रम व मायाजाल
भ्रम व मायाजाल का चश्मा जब उतरता है तो हकीकत अपने घृणित व असहनीय रूप में सामने आती है|
Monday, 4 August 2014
मोदी जी की नेपाल यात्रा
नेपाल को छोटे राष्ट्र के रूप में तबज्जो न देना भारत सरकार की भूल थी जिसे मोदी जी ने अपनी यात्रा के माध्यम से सुधारने की पुरजोर व सराहनीय कोशिश की है| नेपाल अवैध व्यापार व आतंकवाद का बड़ा रास्ता है| अगर नेपाल एवं भारत सरकार संबंध सुलझने के साथ-साथ इन गंभीर मुद्दों पर सार्थक कार्य करें तो चीन,बर्मा,बांग्लादेश आदि देशों के संबंधों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा जिससे भारत को कुटनीतिक सफलता के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी होगा एवं सीमांत लोगों का जीवन स्तर भी सुधरेगा|
Sunday, 3 August 2014
भारतीय ओलंपिक संघ
भारतीय ओलंपिक संघ शतरंज के खिलाड़ी की तरह अपने खिलाड़ियों के कैरियर से खेलता रहता है और जो प्रतिभाशाली खिलाड़ी पसंद नहीं आते उसे प्यादे की तरह दरकिनार कर दिया जाता है| अपने चहेते खिलाड़ियों के हिसाब से नए नियम बना दिए जाते हैं| बावजूद इसके विपरीत स्थिति में हमारे खिलाड़ी देश का नाम रौशन करते रहते हैं परंतु जिस देश में खेल को दिशा दिखाने वाले खिलाड़ी की जगह व्यवसायी एवं नेता होंगें उस देश का खेल भविष्य और देश के खेल की बुनियादी सुविधाओं एवं खिलाड़ियों की प्रतिभावों से खिलवाड़ ही होता रहेगा| ऐसे में पदाधिकारी रंगरेलियां मानते पकड़े जाएँ तो कोई ताज्जुब नहीं है|
बाढ़ से उजड़ता जीवन
बिहार-उत्तर प्रदेश की उफनती नदियों की वजह से हर साल होने वाले मौत के तांडव एवं बाढ़ से घर बार व जान-माल सहित पलायन यह साबित करता है कि आजादी के छ दशकों के बाद भी सरकार को गरीब लोगों की जान की कोई खास परवाह नहीं है| न ही अंधी विकास के रास्ते हम प्रकृति से सामंजस्य ही स्थापित कर पाए हैं| इसके बरक्स बाढ़ की विभीषिका राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट बैंक का साधन, पूंजीपतियों के लिए पुनर्निमाण के नाम पर और अफसरों के लिए योजनाओं के नाम पर लूट का साधन मात्र बन कर रह गया है|
Saturday, 2 August 2014
हिंदी के समसामयिक प्रश्नों से बेखबर
दिल्ली में हिंदी के समसामयिक प्रश्नों से बेखबर छपास व प्रसिद्धि रोग से पीड़ित कुछ हिंदी कवियों, रचनाकारों, आलोचकों व बुद्धिजीवियों की ऐसी जमात है जो वक्त से इतर अर्थहीन व मृतपाय कविताओं, रचनाओं व आलोचनाओं की अर्थी सजाने एवं एक दूसरे की मरी हुई भावनाओं को जिंदा व ताजा बनाए रखने के लिए एक सभा से दूसरी सभा भागते रहते हैं| जो आसपास के दुर्गंध, सड़ी-गली व्यवस्था व हिंदी के लिए चलाए जा रहे आंदोलन आदि से वास्ता न रखते हुए काल्पनिक दुनिया में स्वयं को महफूज रखे हुए हैं| स्वयं के लेखन को अमरत्व देने के लिए नाख़ून भी नहीं शहीद करने वाले लेखकों, कवियों, आलोचकों, बुद्धिजीवियों को न समय माफ़ करेगा न याद रखेगा|
प्रेमचंद
प्रेमचंद शोषित जनों के मुखर आवाज थे| दुनिया को प्रेमचंद ने आम जन के सुख-दुःख को देखने का नया नजरिया दिया | आज प्रेमचंद जैसी संवेदना व प्रभाव पैदा करने वाले रचनाकार नहीं हैं| इसलिए भी गरीबों के प्रति समझ कम हो गई है|
अंग्रेजी की वकालत
अंग्रेजी की वकालत करने वाले अधिकांश लोग यह भूल जाते हैं कि उनकी पिछली पीढ़ी ने हिंदी और भारतीय भाषा व संस्कृति की वकालत करके ही आजादी हासिल की है जिस आजादी में फक्र के साथ वे अंग्रेजियत मानसिकता के शिकार हो गए हैं|
Friday, 1 August 2014
यूपीएससी का भाषाई आधार
यूपीएससी में भाषाई आधार पर समान अवसर उपलब्ध न करा पाना सरकार की इच्छाशक्ति का अभाव एवं आमजन व गरीबों की भाषा का मजाक उड़ाना है जिसे बेवजह भारतीय भाषाओँ के प्रतियोगियों के पिछड़ेपन के रूप में इंगित किया जा रहा है| साजिश के तहत अंग्रेजी के बरक्स पहले अपनी भारतीय भाषाओँ को कमजोर हो जाने दिया गया, फिर उसे अनुवाद के जरिए बोझल बना दिया गया और अब उसे और उससे जुड़े प्रतियोगियों को अर्थहीन मनाकर किनारे किया जा रहा है| भारतीय भाषाओँ की यह लडाई इसलिए भी अहम है कि यह प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओँ की अस्मिता की भी लडाई है| ऐसे में यह कहना भी लाजमी होगा कि भैस का दूध(अंग्रेजी) पीने वाला एवं गाय का दूध(भारतीय भाषाओँ) पीने वालों में अंतर समझना एक कोरी मूर्खता ही है| दोनों को समान अवसर देना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि हमारे देश में शिक्षा का स्तर एवं माध्यम समान नहीं है| बावजूद इसके भारतीय भाषा के गरीब प्रतियोगी अपनी मेधा,परिश्रम एवं प्रतिकूल स्थितियों में परचम लहरा कर अपना स्तुत्य योगदान दे रहे हैं जो कि देश के लिए गर्व का विषय है| अंग्रेजी माध्यम से कितने गरीब घर के बच्चे यूपीएससी कर पाए हैं यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए? सवाल यह भी है कि क्या ऐसी परीक्षा प्रणाली लागू की जाए जिससे भारतीय भाषाओँ में अध्ययन करना जुर्म साबित हो जाए और अंग्रेजी का ज्ञान वरदान? यह हास्यास्पद है कि आजतक हम अपनी ही भाषा को सम्मान नहीं दे पाए, समान अवसर उपलब्ध नहीं करा पाए, मानसिक गुलामी से उबर नहीं पाए, साझा भाषाई संस्कृति की कद्र नहीं कर पाए तो हम आने वाले वक्त में क्या मिसाल गढ़ पाएंगे?
सरकार
सरकार हिंदी भाषियों के फायदे के लिए नहीं अपने फायदे के लिए काम करती है| कोई सरकार को समझा दे कि हिंदी के हित से सरकार को बड़ा फायदा होगा या हिंदी बड़ा नुकसान कर सकती है तो सरकार पेट्रोल,डीजल की तरह आधी रात से हिंदी के हित में प्रावधान लागू कर दे|
अच्छे दिन
अच्छे दिन सरकार के आए हैं जनता के नहीं| जनता को शोषण,महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, अत्याचार एवं अस्थिर वक्त की अंधी सुरंग में धकेल दिया गया है जहाँ अच्छे दिन के सपने आ सकते हैं पर अच्छे दिन नहीं | हाँ एकाध रोशनी टिमटिमाकर अच्छे दिन का आभास करा जाए तो ये और बात है|
Thursday, 31 July 2014
राजनीति की शुचिता
राजनीति शुचिता की जगह व्यवसाय में तब्दील होती जा रही है| ऐसे में नटवर सिंह जैसे अनेक नाम हैं वो वक्त के साथ अपनी मूल्य नहीं बचाए रख पाए| इनकी स्थिति विभीषण सी हो गई और इन लोगों ने रिश्ते की दूरी को अपमान की तरह लेते हुए कीचड़ उछालने का तात्कालिक सुख लेना प्रारंभ कर दिया, जिसे स्वयं ही वक्त का तकाजा व नैतिकता की लडाई मान बैठे | इस लडाई में मद्दे की जगह व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप महत्वपूर्ण हो गए| ऐसे में जनता को राजनीति की कीचड़ में हंस की तरह मोती चुगने की दृष्टि विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि जनता यह भलीभांति समझ सके कि जिसके पास जो है वही तो दे सकता है|
हिंदी आंदोलन से पैदा हुई आग
राजनीति में गरीबी-अमीरी, जाति,धर्म आदि पर गर्मागर्म बहस कर जनता को कुछ होने का अहसास तो कराया जाता है परंतु फैसले सही-गलत के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक फायदा के आधार पर लिए जाते हैं फिर हिंदी भाषियों के भविष्य से सरकार के वर्तमान पर कुछ खास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा,विपक्ष में कोई ताकत है नहीं| इसलिए बहुत संभव है थोड़ी-बहुत रियायत देकर इस हिंदी आंदोलन को शांत कर दिया जाएगा और हिंदी आंदोलन से पैदा हुई आग राख में तब्दील हो जाएगी|
सत्ता की निगाह में हिंदी
सत्ता की निगाह में हिंदी एवं हिंदी भाषियों की छवि पहले जैसी थी आज भी वैसी ही है| भ्रम में हिंदी क्षेत्र के लोग हैं जिन्होंने हिंदी की ताकत से ही बीजेपी को बहुमत की सत्ता दिलाई है| हिंदी की अहमियत आज भी कविता,कहानी,मनोरंजन से ऊपर नहीं आंकीं जाती इसलिए दिल्ली के हिंदी आंदोलन के प्रति सत्ता एवं अंग्रेजियत मानसिकता की प्रतिक्रिया एक सी ही है| अगर यह आंदोलन यूपीएससी तक सिमट गया तो हिंदी की जो आग पैदा हुई है वो राख बनते देर नहीं लगेगी| इस आंदोलन का सबसे बुरा पक्ष हिंदी के मठाधीशों का इस आंदोलन से दूरी है जो यह दर्शाता है कि हिंदी ने जिन्हें कद दिया है वे भी हिंदी को कमतर ही आंकते हैं|
लालू-नीतीश का गठबंधन
लालू-नीतीश का गठबंधन स्वाभाविक नहीं बल्कि अवसरवाद एवं मज़बूरी की राजनीति है जिसमें जनता हासिए पर है और लालू-नीतीश का हित सर्वोपरि| यही कारण है कि लालू-नीतीश के करिश्माई नेता होने के बावजूद जनता में इसका असर कम है| यह अलग बात है कि आने वाले समय में बीजेपी की गलतियों का लाभ लालू-नीतीश कितना उठा पाते हैं |यह देखना भी दिलचस्प होगा|
Wednesday, 30 July 2014
अध्यापक की नौकरी
कालेज एवं विश्वविध्यालय में अध्यापक की नौकरी रेवड़ी की तरह बाँटने की परंपरा चल पड़ी है| अध्यापक जब जोड़ तोड़ कर कालेज पहुंचेंगे तो वे शिक्षा एवं शिक्षार्थी की गुणवत्ता का क्या हश्र करेंगे यह विचारणीय प्रश्न है? इस अराजकता के खिलाफ अधिकांश विद्वानों में मौन स्वीकृति है क्योंकि ले दे कर इन वुधिजीवियों के पास यही ताकत बची है कि अपने चहेतों को कैसे वैतरणी पार करा दे,फिर उनके मुख से न्याय-अन्याय की बात सुनना बेमानी है| शिक्षा की अर्थी निकालने में विश्वविद्यालय के बिके हुए वुधिजीवियों एवं शिक्षा माफिया ही सबसे आगे है,जहाँ जाति,धर्म,पैसे,बल के आधार पर डिग्री से लेकर नौकरी तक सहज उपलब्ध है|
Tuesday, 29 July 2014
अँधेरे में रहने वाली अभिसप्त आँखें
सदियों परंपरा,संस्कृति एवं धर्म से आबद्ध अँधेरे में रहने वाली अभिसप्त आँखें जब आत्मज्ञान की दृष्टि से बदलते वक्त के उजाले में खुलती हैं तब जीवन को रोशनी के लिए भटकना नहीं पड़ता|
महंगाई का पैमाना
जब तक महंगाई का पैमाना डीजल,पेट्रोल,आलू-प्याज-टमाटर आदि है तब तक तो थोड़ी गनीमत है क्योंकि अधिकांश मध्यवर्ग,उच्च वर्ग इसे झेलने में स्वयं को किसी न किसी तरह सक्षम कर लेता है| अगर महंगाई का पैमाना खाने-पीने की अन्य वस्तुओं के साथ ईंट,गिट्टी से होते हुए पढाई-लिखाई ,किराया, स्वास्थ्य सेवाओं के बिल तक पहुँच जाए तो लोगों का जीना तो मुहाल है ही वो अनाप शनाप बयानबाजी वाले नेताओं का जीवन भी दूभर कर देंगे|
हिंदी और हिंदी रचनाकार का जीवन
अधिकांशत: हिंदी और हिंदी रचनाकार का जीवन सुदामा का ही जीवन रहा है जिसे अपने स्वाभिमान के साथ जीना भी आया है और मजबूरीवश सत्ता के साथ समझौता भी करना पड़ा है|
Monday, 28 July 2014
तब धर्म अपना अर्थ खो देता है
जब समाज अपने स्वार्थ के लिए पाप-पुण्य को सुविधानुसार परिभाषित करने लगता है तब धर्म अपना अर्थ खो देता है|
हिंदी समाज की सफलता-असफलता
प्रतिभा एवं योग्यता से इतर चरम चाटुकारिता व अंध भक्ति हिंदी समाज की सफलता-असफलता के बीच की अनिवार्य विवशता बन गई है|
सत्ता एवं विपक्ष
सत्ता एवं विपक्ष का सारा जोर घटना की जिम्मेदारी लेने-देने व एक दूसरे का छीछालेदर करने तथा अपनी पीठ खुद थपथपाने तक ही सीमित हो गई है|
हिंदी पर शलाका पुरुषों का रवैया
हिंदी पर शलाका पुरुषों का रवैया इस कदर है जैसे बेटा माँ पर निबंध तो मार्मिक व जीवंत लिखता है परंतु उस माँ की सुधि लेने कभी नहीं जाता|
हिंदी सहित भारतीय भाषा के प्रति दोहरापन
हिंदी क्षेत्र में पैदा होना एवं हिंदी के स्वाभाविक माहौल में पढ़ना एवं समानता के तहत एक अदद नौकरी की आशा करना, आजाद भारत देश में क्या जुर्म है जिसकी आत्मा व संविधान में हिंदी भाषा पिरोई गई हो तथा एक ऐसी भाषा के विरोध में खड़ा हो जाना जो लंबे समय से देश की पराधीनता की भाषा की सूचक रही हो,क्या सचमुच अपराध है? हिंदी सहित भारतीय भाषा के प्रति दोहरापन देश की मानसिक दुर्बलता का ही परिचायक है| ऐसे समय में जब दुनिया के देश अपनी अस्मिता के लिए सबकुछ कुर्बान करने को तैयार हों ,हमारे नीति नियंता द्वारा अंग्रेजियत मानसिकता से अपनी भाषाई अस्मिता को ही कुर्बान कर देना दुनिया की नजर में हमें और भी हास्यास्पद बना देता है| जिन मुद्दों पर सरकार को स्वत: गंभीर कार्रवाई करनी चाहिए उन मुद्दों पर सड़कों पर बेगुनाहों का खून बहे और हम अपनी नीतियों की दुहाई देकर सच को सच कहने का साहस ही नहीं जुटा पा रहे हों, यह अपने आप में और भी दुर्भाग्यपूर्ण एवं निंदनीय है|
Friday, 25 July 2014
पूजा और इबादत
पूजा और इबादत मनुष्य को मानवीय बनाने का नायाब नुस्खा है जो धर्मांधता में तब्दील होता जा रहा है| पूजा और इबारत के केंद्र तो विकसित हो रहे हैं पर दिल नहीं मिल रहे| आत्म विकास नहीं होने से समाज विकास भी नहीं हो रहा| ऐसे माहौल में भविष्य अंधकारमय हो जाए तो कोई विस्मय नहीं|
हिंदी के प्रति वर्षों की उपेक्षा
हिंदी के प्रति वर्षों की उपेक्षा एवं निष्क्रियता तत्काल आंदोलन बनकर बेशक एकाध मुकाम हासिल कर ले,परंतु अंग्रेजियत मानसिकता के खिलाफ सतत संघर्ष से ही हिंदी एवं हिंदी भाषियों को सम्मान हासिल हो सकता है| यह लडाई सरकार के साथ-साथ सिस्टम यानि प्रशासनिक तंत्र से भी है | अधिकांश प्रशासनिक अमला सचमुच नहीं चाहता कि हिंदी कामकाज की मूल भाषा बने | हाँ अगर सरकार निरंतर मजबूत इच्छाशक्ति दिखाती है तो नि:संदेह यह मुश्किल सा लगता लक्ष्य आसान हो सकता है| वरना भाषाई सौहार्द की बलि चढ़ाकर हिंदी आंदोलन की हवा निकालना कोई कठिन कार्य नहीं, परंतु सरकार ने हिंदी क्षेत्र की ताकत से ही बहुमत की सत्ता पाई है | ऐसे में हिंदी के प्रति अदूरदर्शी निर्णय की वजह से सरकार आने वाले समय में सत्ता गवां भी सकती है|
Thursday, 24 July 2014
Wednesday, 23 July 2014
मानवीयता
मानवीयता स्वयं का सृजित गुण है जो संकीर्णता के बरक्स व्यापकता लाती है, न्यूनतम में भी संतुष्टि का भाव उत्पन्न करती है,स्वयं एवं पर से स्वार्थ रहित प्रेम करना सिखाती है|
Tuesday, 22 July 2014
Monday, 21 July 2014
हिंदी आलोचना
अधिकांश हिंदी आलोचना या तो प्रशस्ति के रूप में या निंदा के रूप में लिखी जा रही है| हिंदी आलोचक में सम्यक दृष्टि का अभाव उत्पन्न होना हिंदी साहित्य की दुर्गति का ही प्रतीक है|
हिंदी भाषा
हिंदी भाषा सहज,सरल,सटीक व मर्म स्पर्शी शब्दों के विपुल भंडार की सार्थक एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति से अनायास ही दिल की भाषा का स्थान ले लेती है| इस वजह से भी हिंदी भाषा वक्ता एवं श्रोता में भावात्मक तारतम्य स्थापित कर प्रभावशाली भूमिका का निर्वाह करती है|
Sunday, 20 July 2014
भारतीय सिनेमा
भारतीय सिनेमा ने एक दौर में बेहतरीन फ़िल्में दीं, बेहतरीन गीत,बेहतरीन कहानी और बेहतरीन कलाकार दिए | अब भारतीय सिनेमा ने हमारे बेहतरीन सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को भी हमसे छीन लिया है| एकाध फिल्मों को छोड़ दें तो भारतीय सिनेमा के लिए यह पतन का दौर है, न फ़िल्में टिक पा रही हैं, न कथावस्तु, न गीत-संगीत, न ही अच्छी व संवेदनशील विषयों पर पैसा लगाने वाले निर्माता एवं फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक ही बचे हैं| कुल मिलाकर फ़िल्मी दुनिया एक ऐसा व्यवसाय बन गया है जिसमें मुनाफा तो ज्यादा है पर सामान बहुत ही घटिया|
भारतीय पत्रकारिता
भारतीय पत्रकारिता के बड़े हिस्से ने अपने दोहरे मानदंड की वजह से पत्रकारिता की गुणवत्ता के सूचकांक को अपने निम्नतर स्तर पर पहुंचा दिया है| मीडिया की आत्मा में फ़िल्मी एवं क्रिकेटी काया प्रवेश कर गई है और वही उसके आदर्श हो गए हैं | अधिकांश पत्रकारिता की जुबान पर सत्यता ,संवेदनशीलता, निर्भीकता की जगह राजनीति चढ़ गई है| पत्रकारिता ने ख़बरों को मसालेदार बनाने की कवायद में खुद को ही हास्यास्पद बना लिया है| भारतीय पत्रकारिता के लिए यह दृष्टिहीनता का दौर है| भारतीय पत्रकारिता अपने पुनर्मूल्यांकन से अगर स्वयं को परिमार्जित कर पाई और स्वयं को विश्व स्तरीय बना पाई तभी अपना वजूद बचा पाएगी| अन्यथा जनता की नजर में पत्रकारिता टी वी सीरियल की वह कहानी बन कर रह गई है जिसमें रस तो बहुत है पर अर्थ नहीं है|
Saturday, 19 July 2014
वीभत्स घटनाएँ
वीभत्स घटनाएँ पुलिस की लापरवाही के साथ-साथ गिरते सामाजिक मूल्य, राजनीतिक व प्रशासनिक दोहरापन , ढहती न्याय व्यवस्था, जीवन का आर्थिक असमान अंतर एवं कानून के प्रति बेख़ौफ़पन का परिणाम है|
सिनेमा
सिनेमा ने अपनी कथावस्तु से संभ्रांत वर्ग और आम वर्ग का भारी अंतर पैदा कर दिया है| सिनेमा यह कह कर नहीं बच सकता कि हम समाज को निरुपित करते हैं| दरअसल सिनेमा वास्तविक समाज को दर्शाने के साथ-साथ आभासी समाज निर्मित भी करता है| सिनेमा की कथावस्तु में एक वर्ग है जिसका पैमाना धन, ऐश्वर्य, कानून एवं सौन्दर्य का उपभोग है एवं दूसरा वर्ग इससे वंचित है| संभ्रांत वर्ग के कुकर्मों पर पर्दा डालने की सामाजिक नियत ने कई बुराइयां पैदा की हैं | जबकि वंचित वर्ग सिनेमा के वैभव को आम जीवन में पाने के लिए बैचैन है,जिसके लिए वह कई बार सारी हदें पार कर जाता है| इन दो वर्गों के जीवन व आर्थिक मूल्यों की टकराहट ,जीवन का असमान अंतर सामाजिक बुराईयों का प्रतिफल है|
धर्म
धर्म जब स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करने का माध्यम बनेगा तभी आत्म विकास भी संभव है एवं जन विकास भी|
इंसानियत
बड़े से बड़ा पद और सम्मान व्यक्ति को आनंद दे सकता है पर समाज और लोक की नजर में इंसानियत का मूल्य इससे कहीं ज्यादा है क्योंकि पद और सम्मान व्यक्ति को समृद्ध करता है जबकि इंसानियत से समाज समृद्ध होता है|
वक्त के आगोश में
वक्त के आगोश में व्यक्ति का सिमटना तय है,परंतु वक्त के साथ सार्थक मुद्दे अवश्य जीवित रहते हैं| अगर व्यक्तिगत दुर्भावना से मुक्त होकर सार्थक मुद्दों पर चर्चा की जाए तो इससे स्वयं एवं समाज को बदलने,उसे सही दिशा देने में मदद मिलेगी|
शिक्षा की भाषा
शिक्षा की भाषा,विषय वस्तु,गुणवत्ता एवं सुविधा में अंतर अमीरी और गरीबी के बीच की गहरी खाई है,जिसे पाटना बहुत ही कठिन है| इसका परिणाम अखिल भारतीय परीक्षाओं में साफ़ दिखता है| अखिल भारतीय परीक्षाओं का मिजाज कान्वेंट स्कूलों के अनुकूल है और समृद्ध वर्ग को सहयोग करने वाला है| इसलिए अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व भारतीय भाषाओँ पर साफ़ दिखाई देता है | इसी वजह से अंग्रेजी भाषी तथा अन्य भाषा भाषी लोगों के जीवन का अंतर भारतीय समाज की कटु सच्चाई है|
मिड डे मिल
मिड डे मिल पेट भरने के साथ-साथ भिखमंगापन भी विकसित कर रहा है| बचपन से ही हर एक चीज के लिए दूसरे का मोहताज बनने की भी शिक्षा दे रहा है|सरकार की आत्म निर्भर बनाने की ज्यादातर योजनाएं आत्म खोखलापन की शिकार हो गई हैं| सरकारी योजनाएं पेड़ लगाने वाली नहीं फल बाँटने वाली बन कर रह गई हैं| कभी लैपटाप,कभी साईकिल बांटकर जीवन की राह दिखाई जा रही है,पर इन योजनाओं में निरंतरता कितनी है| एकांगी योजनाओं के लाभ से कितने दिन घर में उजाला हो सकता है|यह भी विचारणीय प्रश्न है| जरुरत है राज्य/केंद्र स्तर पर बेहतर योजना के साथ एक किन्तु बड़ी और सार्थक योजना के कार्यान्वयन की|
शिक्षा रोजगार का पर्याय है
हमारे देश में शिक्षा रोजगार का पर्याय है|इसलिए शिक्षा से जुड़ने वाले अधिकांश बच्चों एवं अभिभावकों का ध्येय नौकरी हासिल करना है| ज्ञान की परवाह शिक्षक और सरकार को भी नहीं है| इसलिए डाक्टर,इंजीनियर,आई ए एस आदि बनाने कि फैक्ट्री इस देश में काम कर रही है और इन पदों को इतना दुरूह एवं कठिन बना दिया गया है कि इसमें गरीब आदमी का प्रवेश सबसे कम है| फिर शिक्षा का महत्त्व क्या है?अधिकांश सरकारी विद्यालयों में शिक्षा मिड डे मिल के जरिए पेट भरने का साधन मात्र है| जो बच्चे सरकारी स्कूल पहुँच गए हैं उनके शिक्षा का स्तर क्या है?देश की आधी आबादी वास्तविक शिक्षा से बेदखल है और यह गहरी साजिश है ताकि गरीब गरीब बने रह सकें ताकि कायम रह सके गरीबों का हक़ मारने का धंधा और चमकती रह सके देश की राजनीति|
हिंदी कर्मियों का स्वभाव
हिंदी कर्मियों का स्वभाव आत्म संघर्ष का है| चाटुकारिता,हीन भावना,अपनी भाषा को ही दोयम दर्जे का समझने के भाव ने हिंदी प्रतिभा को और भी कुंठित कर दिया है| इसलिए हिंदी की लडाई की चिंगारी भाषाई एकता के अभाव में और भी कमजोर हो गई है| रही सही कसर सरकारी कथनी और करनी ने पूरी कर दी है| ऐसे में जो हिंदी के एकलव्य शेष हैं वो अपना अंगूठा कटाकर करें भी तो क्या करें,जबकि हिंदी के मठाधीश के बोल तक बिके हों और माहौल विपरीत हो|
देश की राजनीति
देश की राजनीति करने वाले दल की दरकार है,स्वयं के हित और विरोधियों के विपरीत राजनीति देश को गर्त में ले जा रही है|
कविता का कंठ खोना
कविता आत्म सौंदर्य का प्रस्फुटन है,जो धर्म,संस्कार की सीमा से परे एक अलौकिक सत्य है| कविता सामाजिक व सांस्कृतिक सत्य को उजागर करने का एक कारगर हथियार है जिसमें सोयी हुई सत्ता एवं आम जन को जगाने की अपार शक्ति है,परंतु जब से कविता राजनीतिक हो गई है अपना कंठ खो बैठी है|
जीवन एक लंबी कतार
जीवन एक लंबी कतार ही तो है| जन्म से लेकर मृत्यु तक स्कूल में,बस में,ट्रेन में,नौकरी में,बैंक-पोस्ट आफिस में,राशन की दुकान में,पासपोर्ट बनाने में,अस्पताल में,वायुयान में,मेट्रो में लोग यंत्रवत कतार में लग जाते हैं| होड़ रहती है कि कैसे शिक्षा, नौकरी, अस्पताल.. हर जगह आगे निकल जाएँ| यह आगे निकलने की होड़ ही उर्जा भी है,जीवंतता भी है,मज़बूरी भी है और जीवन की अर्थवत्ता का खोना भी है|
हिंदी आजाद देश की गुलाम भाषा
हिंदी आजाद देश की गुलाम भाषा बनकर रह गई है| जिन राजनीतिक एवं प्रशासनिक जंजीरों में हिंदी जकड़ दी गई है उससे मुक्ति की राह हिंदी के नए महात्मा गाँधी पैदा करके ही पूरी की जा सकती है| दिल्ली में आंदोलनरत हिंदी प्रेमियों के प्रति आँखें मूंदे सरकारें एवं मीडिया सरोकार ने यह साबित किया है कि उनकी हर आवाज देश के ताकतवर को ही बुलंदी प्रदान करती है| गरीब,असहाय,शोषित,वंचित लोगों की तरह हिंदी को भी हासिए पर डालने की पुरजोर कवायद हो रही है| जब हिंदी आंदोलन की यह चिंगारी आग बनकर फैलेगी तभी हिंदी और हिंदी प्रेमियों की दशा सुधरेगी| सभी हिंदी प्रेमी अपने स्तर से हिंदी मुहिम को धार दें तभी हिंदी और इस देश के अधिसंख्य गरीब हिंदी भाषी लोगों के प्रति न्याय होगा जो वर्षों से अपनी ही रोजी रोटी की भाषा को अपने ही घर में बेइज्जत होते देखने को विवश हैं|
गुरु का कर्ज
गुरु शारीरिक रूप से भले मौजूद न हों,मन में वास तो उनका ही होता है| दृष्टि देने वाले गुरु महानतम व्यक्तित्व के धनी होते हैं| गुरु का कर्ज तभी अदा किया जा सकता है जब गुरु से प्राप्त लौ से आप किसी और का जीवन भी रोशन कर दें|
पुरस्कार
पुरस्कार कई बार व्यक्ति को खोखला कर देता है| अनुगृहित व्यक्ति पुरस्कार के बोझ तले इतना दब जाता है कि सच को झूठ और झूठ को सच समझने का आदी हो जाता है|
दिल्ली में चलाए जा रहे भाषाई आंदोलन
दिल्ली में चलाए जा रहे भाषाई आंदोलन को दिल्ली आंदोलन का नाम दिया जाना चाहिए क्योंकि दिल्ली सत्ता का प्रतीक है और अगर दिल्ली आंदोलन सफल हो गया तो देश की भाषाई विरासत समृद्ध होगी| दिल्ली आंदोलन की सफलता-असफलता देश में भाषा की नई तक़दीर भी लिखेगी | 'यूपीएससी' के बहाने अब दिल्ली आंदोलन भारतीय भाषाओँ की अस्मिता का आंदोलन भी बन चुका है| यह आंदोलन अंग्रेजियत मानसिकता को बदलने में कामयाब रहा तो आने वाले वक्त में वंचित लोगों की भाषा की समृधि से इस देश के आम नागरिक की समृधि सुनिश्चित होगी
अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की विवशता
बेमेल, दुरूह
और अपनी भावभूमि से कटे अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की विवशता ने भी हिंदी की
मौलिकता, सरलता
एवं सहजता का हनन किया है| राजभाषा
हिंदी और आम बोलचाल की हिंदी में बड़ा फर्क इसका उदाहरण है| बेमेल
व निरर्थक अनुवाद की वजह से भी कई बार हिंदी भाषा उपहास
का पात्र बन जाती है तथा अंग्रेजियत
मानसिकता वाले लोगों को हिंदी भाषा को कमजोर
आंकने का एक आधार मिल जाता है|
कवि होना
कवि होना धर्म,संप्रदाय,सीमा एवं वक्त
से परे मानवीय होना है| कवि की दृष्टि की संपूर्णता में सृष्टि
समाहित है|
कवि का कथ्य आत्म कथ्य है| कवि की दायित्व घनघोर अँधेरे एवं तूफान में इंसानियत की लौ की
रक्षा करना है|
पिता का होना
पिता का होना आसमान का साथ होना है और माता का होना धरती का साथ होना है| जैसे धरती आसमान के बिना अधूरी है,वैसे ही माता-पिता का भी अकेले होना अधूरापन है| हमारे पैर धरती के सहारे बेशक मजबूती से चलें पर आसमान सिर पर न हो तो खुद के चलने पर भी भरोसा कम हो जाता है| पिता का न होना इसी भरोसे को ताउम्र स्वयं में तलाशना है|
Friday, 18 July 2014
बलात्कार
बलात्कार एक घटना से ज्यादा घृणित मानसिकता है जो जगह एवं व्यक्ति के बदलने के साथ बदस्तूर जारी है| जब तक पीड़ित व्यक्ति का ओहदा देखकर कार्रवाई की जाती रहेगी तब तक बलात्कार का पूरी तरह से सफाया नामुमकिन है| बलात्कार की घटना कहीं की हो, किसी जाति-धर्म के साथ हो आवाज और प्रतिरोध का स्वर आसमान को छूना चाहिए| दूसरी अहम बात बेटी,बहु,माँ को जितनी इज्जत मिलनी चाहिए,क्या हमारा समाज उनता सम्मान उन्हें दे पाता है? नहीं न, जब उच्च सम्मान की भावना न समाज में है,न फिल्मों में,न मीडिया में,न न्याय व्यवस्था में तो ऐसे में बलात्कारी मानसिकता पर सतत गंभीरता कैसे संभव है?
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