हिंदी के प्रति वर्षों की उपेक्षा एवं निष्क्रियता तत्काल आंदोलन बनकर बेशक एकाध मुकाम हासिल कर ले,परंतु अंग्रेजियत मानसिकता के खिलाफ सतत संघर्ष से ही हिंदी एवं हिंदी भाषियों को सम्मान हासिल हो सकता है| यह लडाई सरकार के साथ-साथ सिस्टम यानि प्रशासनिक तंत्र से भी है | अधिकांश प्रशासनिक अमला सचमुच नहीं चाहता कि हिंदी कामकाज की मूल भाषा बने | हाँ अगर सरकार निरंतर मजबूत इच्छाशक्ति दिखाती है तो नि:संदेह यह मुश्किल सा लगता लक्ष्य आसान हो सकता है| वरना भाषाई सौहार्द की बलि चढ़ाकर हिंदी आंदोलन की हवा निकालना कोई कठिन कार्य नहीं, परंतु सरकार ने हिंदी क्षेत्र की ताकत से ही बहुमत की सत्ता पाई है | ऐसे में हिंदी के प्रति अदूरदर्शी निर्णय की वजह से सरकार आने वाले समय में सत्ता गवां भी सकती है|
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