Translate

Saturday, 31 January 2015

झूठ का विज्ञापन

भारत सरकार के सर्वोच्च सम्मान से अभिनेताओं/खिलाडियों को तभी सम्मानित किया जाना चाहिए जब वे बाजारवादी विज्ञापनों से परहेज करते हुए सामाजिक योजनाओं का प्रचार-प्रसार करने का लिखित आश्वासन दें| अन्यथा यह ढोंग लगता है कि भारत रत्न/पद्म श्री/पद्म विभूषण से सम्मानित लोग साबुन/तेल आदि के झूठे गुणों का प्रचार कर आम जन की भावनाओं से खेलते हैं| ऐसे लोगों को स्वत: ही बाजारवादी सोच से ऊपर उठ कर जन हितार्थ कार्य करना चाहिए क्योंकि जिस ओहदे पर सम्मान प्राप्त करने वाले अभिनेता/खिलाडी होते हैं वहां धन से ज्यादा सम्मान का मूल्य है| 

बदनाम

कई बार दूसरों को बदनाम करते-करते आप स्वयं बदनाम हो जाते हैं|

आत्म मूल्य

कुछ लोग आसमान की ऊँचाई पाने के लिए अपनी जड़ों से समझौता कर आत्म  मूल्य गवां देते हैं|

दिमाग की गंदगी

दिमाग की गंदगी ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक दुर्गंध पैदा कर मानवता को शर्मशार करती है| भावों एवं विचारों की स्वच्छता से ही आत्मविकास व जन कल्याण संभव है|

जीवन

जीवन की गति के साथ विवेक का ब्रेक न हो तो जीवन अधोगति को प्राप्त हो जाता है|

Wednesday, 28 January 2015

लक्ष्य

कोई कठिन लक्ष्य आप हासिल कर लें तो शेष लक्ष्य आसान लगने लगते हैं|

Monday, 26 January 2015

देशभक्त

इंडिया गेट पर खड़े हो जाने से व्यक्ति देशभक्त हो जाए यह जरुरी नहीं, देशभक्त वे हैं जिन्होंने हमें इंडिया गेट पर गर्व के साथ खड़ा होने का साहस एवं नया उजाला दिया|

भारतीय राजनीति

भारतीय राजनीति मन, वचन, कर्म द्वारा विपक्षी नेता एवं दल को निम्नतर साबित करने के लिए भावनात्मक व षड्यंत्रकारी तरीके अपनाने का खेल बन गई है,जिसका एक मात्र उद्देश्य मूल्यों से समझौता करते हुए गलाकाट प्रतियोगिता में स्वयं को जिलाए रखना एवं विरोधी आवाज को कुचलना भर बन कर रह गया है|

Sunday, 25 January 2015

जिसने पाप न किया हो

किसी दल को अछूत की नजर से देखना अपनी दृष्टि का ही दोष है,इसके वनिस्पत दल के चेहरों की परख की जानी चाहिए क्योंकि आज के माहौल में सभी दलों में ऐसे लोग मौजूद हैं जिसके बारे में कहा जा सकता है कि 'जिसने पाप न किया हो,वह पहला पत्थर मारे..'

Saturday, 24 January 2015

फैसले

कई बार फैसले सही-गलत नहीं होते बल्कि उसे स्व-प्रयासों द्वारा सही-गलत साबित किया जाता है|

ओबामा की आवभगत

देश वह महान और समृद्ध होता है जो अपने आम आदमी को भी विशिष्ट का दर्जा देता है| अन्यथा व्यक्ति विशेष के लिए की गई कवायद हास्यास्पद बन आम आदमी का मजाक उड़ाते दिखती है| 
पता नहीं भारत के प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति के स्वागत एवं सुरक्षा के लिए अन्य राष्ट्र कितना अपने स्वाभिमान से समझौता करते हैं ? अतिथि देवो भव: की परंपरा का निर्वाह करते हुए हम अपने आप को इतना दीनहीन क्यों बना लेते हैं,यह भी विचारणीय प्रश्न है| यहाँ यह भी देखना दिलचस्प है कि भारतीय मीडिया विश्लेषण एवं चाटुकारिता का अंतर ही मिटा देता है|

Friday, 23 January 2015

साथ

साथ चलने वाले साथी जब सदा के लिए बिछड़ जाते हैं तब एहसास होता है कि जिंदगी का एक सिरा कहीं कट कर गिर गया है जिसके बगैर ही जीवन का रास्ता तय करना होगा| 

दुःख-सुख

जीवन के कुछ दुःख अनहोनी सुख की पटकथा लिख रहे होते हैं, परंतु वक्त के थपेड़ों में पड़कर कुछ दुःख, सुख की अनुभूति से पहले ही दम तोड़ कर जीवन को नया अर्थ भी दे जाते हैं|

Monday, 19 January 2015

गलत

ज्यों हीं आप किसी व्यक्ति विशेष या दल के हर बात को सही साबित करने लगते हैं,आप गलत हो जाते हैं|

सत्ता लोलुप नेता

सत्ताधारी दल से दिल नहीं मिलने वाले नेता कई बार स्व हित में सत्ताधारी दल को लोभवश अपना लेते हैं| ऐसे में सत्ताधारी दल को भी चाहिए कि अपने पुराने सहयोगियों को दरकिनार कर नए चेहरों को ज्यादा तवज्जों न दे|  जितना लाभ आयातित नेताओं से नहीं होता उससे ज्यादा भीतरघात से नुकसान हो जाता है एवं कई बार आंकड़ों की जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दों की जीत होती है,जिससे पार्टी व जनता दोनों का भला होता है| 

Sunday, 18 January 2015

नायकत्व धर्म

यह दुनिया नायकत्व के बोझ तले दबी हुई है, जो नायक पत्थर से देवता बन उभरते हैं वे पारस नहीं बनते,पत्थरों को देवता नहीं बनने देते| देवता अपने पूजत्व धर्म में सदियों से पत्थरों को कंकड़ में तब्दील करते आए हैं | आत्म प्रशंसा में ग्रंथ के पन्ने रंगते आए हैं| इन नायकों ने नपुंसक सभ्यता एवं आत्म विलीन संस्कृति को जन्म दिया है|यही वजह है कि किसी में नायकत्व की झलक मिलते ही हम पागल हो जाते हैं,उसके अनुयायी बनना ही अपने जीवन का अर्थ समझने लगते हैं|   

Friday, 16 January 2015

वैचारिक

वैचारिक वैमनस्यता एवं वैचारिक आलस्य दोनों से दुनिया आक्रांत है|

सामाजिक विकास

सामाजिक विकास का अधिकांश रास्ता राजनीति और सत्ता के गलियारे से गुजर कर स्व- विकास तक सीमित रह जाता है| 

अन्ना आन्दोलन के सिपाही

अन्ना आन्दोलन को धार देने की जिन लोगों पर प्रमुख जिम्मेदारी थी वे सभी राजनीति की धार में बहकर देश की जनता के अरमानों को किनारे लगा गए| देखना यह है, कि ये लोग जहाँ हैं वहां वे अपने तात्कालिक लाभ से उबरते हुए कितना अपनी पहचान बना पाते हैं| अन्ना हजारे तो एक मोहरा बनकर रह गए और एक आग जो वक्त की पहचान बन सकती थी वह आग वक्त के पहले ही बुझा दी गई|

Monday, 12 January 2015

विकास बनाम व्यक्ति की राजनीति

जनता भारतीय राजनीति के 'विकास बनाम व्यक्ति' की लड़ाई में व्यक्ति को तवज्जो देती आई है| इस वजह से जनता व्यक्ति के मोह में फंसकर उसे सत्ता व सम्मान तो दिला देती है,परंतु ज्यों ही वह व्यक्ति जनता के मोह से उबरता है हासिए पर चला जाता है| अन्ना हजारे इसके उदाहरण हैं| यह कतई जरुरी नहीं कि किसी भी राजनेता या दल का हर फैसला सही ही हो| सबकी अपनी विषमताएँ एवं विशेषताएं हैं| परंतु जनता का व्यक्तिगत मोह से उबर कर लिया गया हर फैसला सही हो सकता है,अगर वह मीडिया द्वारा प्रायोजित न हो,थोपा हुआ न हो| ऐसे में कोई दल सत्ता में आए विकास के सवालों को केंद्र में रखेगा अन्यथा बहुत बड़े बवंडर से समाज का भला हो यह कोई जरुरी नहीं है|  

Thursday, 8 January 2015

पांव तले की दुब

अगर पशु-पक्षी,पेड़-पौधे के भी अपने-अपने  देवी-देवता होते और वे अपनी सुविधानुसार अपने-अपने देवी-देवता का उपयोग करते तो इस दुनिया का रंग ही कुछ और होता| पशु-पक्षी अपनी-अपनी  बिरादरी के ही दुश्मन होते | आम-आम से दुश्मनी निभा रहा होता| परंतु पशु-पक्षी,पेड़-पौधे सब प्रकृति के देवत्व में जीते हैं,बिना किसी संग्रह की लालसा के दूसरों को देना ही अपने जीवन का मूल्य समझते हैं| शायद इसलिए भी खुशहाल दिखते हैं| काश कि मनुष्य की आँखें भी प्रकृति की ओर खुली होतीं तो वो शिक्षा जो अहम की वजह से किताबों, गोष्ठियों  में नहीं मिल पाई उससे बड़ी शिक्षा पांव तले की दुब में मिल जाती|

Monday, 5 January 2015

विचार

विचार आग की तरह होते हैं जिसका विवेकसम्मत व सकारात्मक उपयोग सृजन तथा दृष्टिहीन व  नकारात्मक प्रयोग विध्वंस की ओर ले जाता है| विचार ही धर्म, विकास, विज्ञान की आधारशिला है, परंतु जब कुछ सीमित लोग असीमित बल के आधार पर विचार को अपने स्वार्थ की कठपुतली बना लेते हैं तब आमजन को सबसे ज्यादा उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है | 

शोषित जन  धर्म, विकास एवं विज्ञान के मुद्दे पर सार्थक सवाल उठाने की बजाय मुट्ठी भर लोगों के थोपे गए विचार के आधार पर गुमराह हो जाते हैं | ऐसे में जो जन सार्थक सवाल उठाते हैं उनके सवालों को तंत्र द्वारा या तो दबा दिया जाता है या सवाल उठाने वालों को ही उठा दिया जाता है| संकट इन्हीं सार्थक विचारों को बचाए रखने एवं उस विचार को संजीवनी देने का है जिसके लिए जिगर भी चाहिए और लोभ-लालच से मुक्ति भी| दुर्भाग्य से अधिकांश विचारक लोभ या भय का अंतत: शिकार हो जाते हैं जो कि भावी वक्त के लिए अत्यंत ही खतरनाक है|   

Friday, 2 January 2015

प्रगतिशीलता

ऐसी प्रगतिशीलता किस काम कि जो पैरों तले की जमीन को भूलकर आसमान की बातें करें|