यह दुनिया नायकत्व के बोझ तले दबी हुई है, जो नायक पत्थर से देवता बन उभरते हैं वे पारस नहीं बनते,पत्थरों को देवता नहीं बनने देते| देवता अपने पूजत्व धर्म में सदियों से पत्थरों को कंकड़ में तब्दील करते आए हैं | आत्म प्रशंसा में ग्रंथ के पन्ने रंगते आए हैं| इन नायकों ने नपुंसक सभ्यता एवं आत्म विलीन संस्कृति को जन्म दिया है|यही वजह है कि किसी में नायकत्व की झलक मिलते ही हम पागल हो जाते हैं,उसके अनुयायी बनना ही अपने जीवन का अर्थ समझने लगते हैं|
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