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Sunday, 26 November 2017

हिंसा

समाज में हिंसा इतनी सहज स्वीकार्य हो गई है कि अहिंसक लोग ही असहज महसूस करने लगे हैं।

दिखावा

दिखावा दोनों ही निंदनीय है चाहे वह अमीर होकर गरीब का हो या गरीब होकर अमीर का हो।

जातिवाद

जातिवाद आधारित ज्यादातर संघठन न तो खुद का हित कर पा रहे हैं न समाज का।

दुःख

दुःख तब नहीं होता जब कोई नहीं चलता बल्कि दुःख तब होता है जब कोई अपनी पूरी ताकत से चलता है और कोई उसे जबरन रोक देता है।

दृष्टि

कई बार परिस्थिति वश दृष्टि संकुचित हो जाती है जो परिस्थिति बदलने के वाबजूद व्यापक नहीं हो पाती।

Wednesday, 22 November 2017

व्यक्तित्व

जीवन की सफलता पद नहीं व्यक्तित्व है। इसलिए भी व्यक्तित्व की ऊंचाई के सामने पद की ऊंचाई बौनी साबित हो जाती है।

बच्चे

जीवन के पूर्वार्ध में हम बच्चों को समय नहीं दे पाते एवं उत्तरार्ध में बच्चे।

पूजा

जब आप किसी की पूजा करने लगते हैं तो उसके पापों को भी सहज स्वीकार कर लेते हैं।

हार

अपनी असीम क्षमता को पहचाने बिना छोटी-छोटी समस्याओं से घिरे रहने की मानसिक प्रवृति ही अक्सर हार का कारण बनती है।

दृष्टि

कई बार हम अपने जीवन में जो विचारों का चश्मा पहनते हैं उसे चाहे-अनचाहे कभी उतार ही नहीं पाते चाहे दृष्टि ही क्यों न खो जाए।

सम्मान

अगर प्रतिभा का सम्मान समाज न कर पाए तो दोष प्रतिभा का नहीं समाज का है।

खेल

कुछ लोग अपनी जिंदगी से खेल कर खुद को बर्बाद कर लेते हैं और कुछ लोग अपनी जिंदगी को खेल-खेल में व्यतीत कर लेते हैं।

सामंजस्य

आपके शब्द एवं अर्थ का आपके जीवन से भी सामंजस्य होना आवश्यक है अन्यथा सब व्यर्थ है।

सही

दूसरे को गलत साबित करने से ज्यादा जरूरी खुद को सही साबित करना है।

कद

अक्सर हम अपना कद बड़ा करने की बजाय दूसरे का कद कम करने में लगे रहते हैं और अंततः अपना ही कद कम कर लेते हैं।