Translate

Sunday, 13 August 2017

मानसिक सम्पन्नता

कई बार आर्थिक सम्पन्नता के वाबजूद मानसिक विपन्नता नहीं जाती और कई बार आर्थिक विपन्नता के वाबजूद मानसिक सम्पन्नता आ जाती है। 

मानसिक सम्पन्नता आर्थिक सम्पन्नता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण व मूल्यवान है और मानसिक सम्पन्नता मानव धर्म का पर्याय भी है जिसके लिए हृदय की उदारता व प्रेम अनिवार्य है।

रणक्षेत्र

जिंदगी के रणक्षेत्र में चाहने वाले भी हैं और वार करने वाले भी।
दोनों जरूरी हैं। दोनों का सम्मान जरूरी।

जिंदगी की पिच

जिंदगी की पिच पर अगर कोई ख़राब खेल रहा हो तो क्रिकेट की तरह उस वक्त अत्यंत कौशल एवं धैर्य से खेलने की जरूरत होती है ताकि उस संबंध की रक्षा की जा सके एवं जिंदगी की जंग को प्रेमपूर्वक व सम्मान सहित जीता जा सके।

पिता

जब तक पिता जीवन रथ के सारथी हैं तब तक संतान अपराजेय है।

प्रतिभा

जो प्रतिभा दबाव में निखरे वही सम्मान योग्य है।

भयावह सभ्यता

मन,वचन,कर्म से हम हिंसक समाज की ओर बढ़ते जा रहे हैं और जाने-अनजाने वैश्विक स्तर पर भयावह सभ्यता पाँव पसार रही है।

लेखन

लेखन
संजीदा लोगों की भाषा एवं सोच में भी पीत पत्रिकारिता घर करती जा रही है और लेखन प्रतिक्रियावादी होता जा रहा है जिससे विमर्श का स्वरूप संकुचित होता जा रहा है।

कुल मिलाकर लेखन सामंजस्यता के बरक्स दो गुटों के वैमनस्य का शिकार हो गया है।

नारी समाज

भारतीय समाज अपने तमाम प्रयत्नों के वाबजूद नारी को पूर्ण सुरक्षा व सम्मान देने में नाकाम ही रहा है और दुःखद यह भी कि नारी समाज स्वयं भी अपने आत्म सम्मान के प्रति पूर्ण जागरूक व संजीदा नहीं है। 

फासले

कुछ फासले सदियों के पल भर में तय हो जाते हैं
कुछ फासलों को तय करने में जीवन बीत जाता है|

भयावह समय

इस भयावह समय में अपने अंदर प्रेम व सम्मान बचाए रखना स्वयं के लिए एक बड़ी चुनौती है।

नाकाम

कई लोगों को सीमित शिक्षा के वाबजूद जिंदगी की कठिन परीक्षा में सफल होने का असीमित अनुभव होता है और कई लोग उच्चतम शिक्षा के वाबजूद जिंदगी में नाकाम हो जाते हैं।

वक्त

मान,अपमान,सम्मान की धुरी पर जिंदगी घूमती रहती है और वक्त काफ़ूर हो जाता है।

बड़बोलापन

बड़बोलापन भारतीय राजनीति की पहचान बनता जा रहा है। सभी पार्टियों में दम्भ भरने वाले कलाबाज हैं जो अंततः अपनी ही पार्टी का जड़ खोदते हैं।

तुच्छ

बिना बड़े संघर्ष के, बिना बड़ी चुनौतियों के जो कुछ भी हासिल होगा वह छोटा और तुच्छ ही होगा।।

लक्ष्य

जब आप अपनी कमियों की वजह से हारने लगते हैं तब साधारण एवं आसान लक्ष्य भी कठिन लगने लगते हैं।

राय

राय की विशेष चिंता नहीं करनी चाहिए, वह अक्सर बदलती रहती है चाहे खुद की हो, खुद के प्रति हो या दूसरे की।

हिन्दी समाज

कमोबेश हिन्दी समाज आत्ममुग्ध एवं संकुचित समाज में तब्दील होने की राह पर है। 

वैचारिक मतभेद

वैचारिक मतभेद का सम्मान करते हुए व्यक्तिगत संबंधों की प्रगाढ़ता बनाए रखना ही हृदय की विशालता है।

सहज

दबाव एवं अभाव में जो सहज रह लिया उसके लिए असहज कुछ भी नहीं।

दर्द

जिंदगी में कुछ लोगों का होना बेशक आनंदित न करता हो पर उनका न होना बेहिसाब दर्द जरूर देता है।

पक्षधरता

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों का बर्ताव पार्टी प्रवक्ता जैसा होता है। पक्षधरता को इतना धर लेते हैं कि मुद्दा सिरे से गायब हो जाता है।

कवि

कवि होना धर्म,संप्रदाय,सीमा एवं वक्त से परे मानवीय होना है| कवि की दृष्टि की संपूर्णता में सृष्टि समाहित है| कवि का कथ्य आत्म कथ्य है| कवि का दायित्व घनघोर अँधेरे एवं तूफान में इंसानियत की लौ की रक्षा करना है|

प्रेम

प्रेम का अर्थ यह नहीं अलग अलग लोगों में प्रेम ढूंढा जाए बल्कि हर स्तर पर हर मुश्किलात में भी प्रेम बनाए रखने के उपाय किए जाएं।

आवाज

खुद की बाँसुरी को किसी की आवाज का मोहताज न बनाएं।

अंतर्मन

बाहर चाहे कितना ही घना अंधेरा हो, अंतर्मन में उससे कहीं अधिक उजाले की क़ाबलियत होती है।

संबंध

संबंधों के उजाले और अंधेरे को समेकित रूप से निभाना ही संबंधों का सम्मान करना है।

फासला

कई बार बड़े लोगों से फासला रखना जरूरी हो जाता है, नजदीक आने पे वे छोटे लगने लगते हैं।

मानवीयता

यह भ्रम है कि उच्च पद की अनिवार्य विशेषता मानवीय होना भी है| मानवीयता स्वयं का सृजित गुण है जो संकीर्णता के बरक्स व्यापकता लाती है, न्यूनतम में भी संतुष्टि का भाव उत्पन्न करती है,स्वयं एवं पर से स्वार्थ रहित प्रेम करना सिखाती है|

रचना

रचना का लक्ष्य अगर स्वयं हो तो स्वयं के साथ-साथ दूसरे के लिए भी वह सार्थक हो सकती है|

कठिन समय

कठिन समय में सबसे जरूरी है खुद की निष्पक्षता को बरकरार रखते हुए सच कहने का साहस बचाए रखना।

धर्म

जब समाज अपने स्वार्थ के लिए पाप-पुण्य को सुविधानुसार परिभाषित करने लगता है तब धर्म अपना अर्थ खो देता है|

संतुलन

विचारों का संतुलन आवश्यक है जैसे ही आप किसी एक पक्ष की ओर झुक जाते हैं दूसरे पक्ष के प्रति जाने-अनजाने अन्याय करने लगते हैं।

विचार

विचार वे बड़े व मूल्यवान होते हैं जो व्यवस्था परिवर्तन में सहायक होते हैं न कि व्यक्ति केंद्रित विचार जो कि परस्पर घृणा- द्वेष  एवं पूर्वाग्रह पर ही आधारित होते हैं।
                               

मनुष्य

मनुष्य ऐसा प्राणी है जो सोचता कुछ है, बोलता कुछ है और करता कुछ और ही है। इसलिए किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करना अत्यंत कठिन है।
           

नैतिकता

जब किसी व्यक्ति या घटना की आलोचना में आपकी घृणा भी शामिल हो जाती है तब आप भी नैतिकता खोकर राम-रावण का अंतर मिटा देते हैं।