Translate

Thursday, 31 July 2014

राजनीति की शुचिता

राजनीति शुचिता की जगह व्यवसाय में तब्दील होती जा रही है| ऐसे में नटवर सिंह जैसे अनेक नाम हैं वो वक्त के साथ अपनी मूल्य नहीं बचाए रख पाए| इनकी स्थिति विभीषण सी हो गई और इन लोगों ने रिश्ते की दूरी को अपमान की तरह लेते हुए कीचड़ उछालने का तात्कालिक सुख लेना प्रारंभ कर दिया, जिसे स्वयं ही वक्त का तकाजा व नैतिकता की लडाई मान बैठे | इस लडाई में मद्दे की जगह व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप महत्वपूर्ण हो गए| ऐसे में जनता को राजनीति की कीचड़ में हंस की तरह मोती चुगने की दृष्टि विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि जनता यह भलीभांति समझ सके कि जिसके पास जो है वही तो दे सकता है|

हिंदी आंदोलन से पैदा हुई आग

राजनीति में गरीबी-अमीरी, जाति,धर्म आदि पर गर्मागर्म बहस कर जनता को कुछ होने का अहसास तो कराया जाता है परंतु फैसले सही-गलत के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक फायदा के आधार पर लिए जाते हैं फिर हिंदी भाषियों के भविष्य से सरकार के वर्तमान पर कुछ खास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा,विपक्ष में कोई ताकत है नहीं| इसलिए बहुत संभव है थोड़ी-बहुत रियायत देकर इस हिंदी आंदोलन को शांत कर दिया जाएगा और हिंदी आंदोलन से पैदा हुई आग राख में तब्दील हो जाएगी| 

सत्ता की निगाह में हिंदी

सत्ता की निगाह में हिंदी एवं हिंदी भाषियों की छवि पहले जैसी थी आज भी वैसी ही है| भ्रम में हिंदी क्षेत्र के लोग हैं जिन्होंने हिंदी की ताकत से ही बीजेपी को बहुमत की सत्ता दिलाई है| हिंदी की अहमियत आज भी कविता,कहानी,मनोरंजन से ऊपर नहीं आंकीं जाती इसलिए दिल्ली के हिंदी आंदोलन के प्रति सत्ता एवं अंग्रेजियत मानसिकता की प्रतिक्रिया एक सी ही है| अगर यह आंदोलन यूपीएससी तक सिमट गया तो हिंदी की जो आग पैदा हुई है वो राख बनते देर नहीं लगेगी| इस आंदोलन का सबसे बुरा पक्ष हिंदी के मठाधीशों का इस आंदोलन से दूरी है जो यह दर्शाता है कि हिंदी ने जिन्हें कद दिया है वे भी हिंदी को कमतर ही आंकते हैं| 

लालू-नीतीश का गठबंधन

लालू-नीतीश का गठबंधन स्वाभाविक नहीं बल्कि अवसरवाद एवं मज़बूरी की राजनीति है जिसमें जनता हासिए पर है और लालू-नीतीश का हित सर्वोपरि| यही कारण है कि लालू-नीतीश के करिश्माई नेता होने के बावजूद जनता में इसका असर कम है| यह अलग बात है कि आने वाले समय में बीजेपी की गलतियों का लाभ लालू-नीतीश कितना उठा पाते हैं |यह देखना भी दिलचस्प होगा|

Wednesday, 30 July 2014

अध्यापक की नौकरी

कालेज एवं विश्वविध्यालय में अध्यापक की नौकरी रेवड़ी की तरह बाँटने की परंपरा चल पड़ी है| अध्यापक जब जोड़ तोड़ कर कालेज पहुंचेंगे तो वे शिक्षा एवं शिक्षार्थी की गुणवत्ता का क्या हश्र करेंगे यह विचारणीय प्रश्न है? इस अराजकता के खिलाफ अधिकांश विद्वानों में मौन स्वीकृति है क्योंकि ले दे कर इन वुधिजीवियों के पास यही ताकत बची है कि अपने चहेतों को कैसे वैतरणी पार करा दे,फिर उनके मुख से न्याय-अन्याय की बात सुनना बेमानी है| शिक्षा की अर्थी निकालने में विश्वविद्यालय के बिके हुए वुधिजीवियों एवं शिक्षा माफिया ही सबसे आगे है,जहाँ जाति,धर्म,पैसे,बल के आधार पर डिग्री से लेकर नौकरी तक सहज उपलब्ध है|

Tuesday, 29 July 2014

अँधेरे में रहने वाली अभिसप्त आँखें

सदियों परंपरा,संस्कृति एवं धर्म से आबद्ध अँधेरे में रहने वाली अभिसप्त आँखें जब आत्मज्ञान की दृष्टि से बदलते वक्त के उजाले में खुलती हैं तब जीवन को रोशनी के लिए भटकना नहीं पड़ता| 

महंगाई का पैमाना

जब तक महंगाई का पैमाना डीजल,पेट्रोल,आलू-प्याज-टमाटर आदि है तब तक तो थोड़ी गनीमत है क्योंकि अधिकांश मध्यवर्ग,उच्च वर्ग इसे झेलने में स्वयं को किसी न किसी तरह सक्षम कर लेता है| अगर महंगाई का पैमाना खाने-पीने की अन्य वस्तुओं के साथ ईंट,गिट्टी से होते हुए पढाई-लिखाई ,किराया, स्वास्थ्य सेवाओं के बिल तक पहुँच जाए तो लोगों का जीना तो मुहाल है ही वो अनाप शनाप बयानबाजी वाले नेताओं का जीवन भी दूभर कर देंगे|    

हिंदी और हिंदी रचनाकार का जीवन

अधिकांशत: हिंदी और हिंदी रचनाकार का जीवन सुदामा का ही जीवन रहा है जिसे अपने स्वाभिमान के साथ जीना भी आया है और मजबूरीवश सत्ता के साथ समझौता भी करना पड़ा है|

Monday, 28 July 2014

तब धर्म अपना अर्थ खो देता है

जब समाज अपने स्वार्थ के लिए पाप-पुण्य को सुविधानुसार परिभाषित करने लगता है तब धर्म अपना अर्थ खो देता है|

हिंदी समाज की सफलता-असफलता

प्रतिभा एवं योग्यता से इतर चरम चाटुकारिता व अंध भक्ति हिंदी समाज की सफलता-असफलता के बीच की अनिवार्य विवशता बन गई है|

सत्ता एवं विपक्ष

सत्ता एवं विपक्ष का सारा जोर घटना की जिम्मेदारी लेने-देने व एक दूसरे का छीछालेदर करने तथा अपनी पीठ खुद थपथपाने तक ही सीमित हो गई है|

हिंदी पर शलाका पुरुषों का रवैया

हिंदी पर शलाका पुरुषों का रवैया इस कदर है जैसे बेटा माँ पर निबंध तो मार्मिक व जीवंत लिखता है परंतु उस माँ की सुधि लेने कभी नहीं जाता|

हिंदी सहित भारतीय भाषा के प्रति दोहरापन

हिंदी क्षेत्र में पैदा होना एवं हिंदी के स्वाभाविक माहौल में पढ़ना एवं समानता के तहत एक अदद नौकरी की आशा करना, आजाद भारत देश में क्या जुर्म है जिसकी आत्मा व  संविधान में हिंदी भाषा पिरोई गई हो तथा एक ऐसी भाषा के विरोध में खड़ा हो जाना जो लंबे समय से देश की पराधीनता की भाषा की सूचक रही हो,क्या सचमुच अपराध है? हिंदी सहित भारतीय भाषा के प्रति दोहरापन देश की मानसिक दुर्बलता का ही परिचायक है| ऐसे समय में जब दुनिया के देश अपनी अस्मिता के लिए सबकुछ कुर्बान करने को तैयार हों ,हमारे नीति नियंता द्वारा अंग्रेजियत मानसिकता से अपनी भाषाई अस्मिता को ही कुर्बान कर देना दुनिया की नजर में हमें और भी हास्यास्पद बना देता है| जिन मुद्दों पर सरकार को स्वत: गंभीर कार्रवाई करनी चाहिए उन मुद्दों पर सड़कों पर बेगुनाहों का खून बहे और हम अपनी नीतियों की दुहाई देकर सच को सच कहने का साहस ही नहीं जुटा पा रहे हों, यह अपने आप में और भी दुर्भाग्यपूर्ण एवं निंदनीय है| 

Friday, 25 July 2014

पूजा और इबादत

पूजा और इबादत मनुष्य को मानवीय बनाने का नायाब नुस्खा है जो धर्मांधता में तब्दील होता जा रहा है| पूजा और इबारत के केंद्र तो विकसित हो रहे हैं पर दिल नहीं मिल रहे| आत्म विकास नहीं होने से समाज विकास भी नहीं हो रहा| ऐसे माहौल में भविष्य अंधकारमय हो जाए तो कोई विस्मय नहीं|

हिंदी के प्रति वर्षों की उपेक्षा

हिंदी के प्रति वर्षों की उपेक्षा एवं निष्क्रियता तत्काल आंदोलन बनकर बेशक एकाध मुकाम हासिल कर ले,परंतु अंग्रेजियत मानसिकता के खिलाफ सतत संघर्ष से ही हिंदी एवं हिंदी भाषियों को सम्मान हासिल हो सकता है|  यह लडाई सरकार के साथ-साथ सिस्टम यानि प्रशासनिक तंत्र से भी है | अधिकांश प्रशासनिक अमला सचमुच नहीं  चाहता कि हिंदी कामकाज की मूल भाषा बने | हाँ अगर सरकार निरंतर मजबूत इच्छाशक्ति दिखाती है तो नि:संदेह यह मुश्किल सा लगता लक्ष्य आसान हो सकता है| वरना भाषाई सौहार्द की बलि चढ़ाकर हिंदी आंदोलन की हवा निकालना कोई कठिन कार्य नहीं, परंतु सरकार ने हिंदी क्षेत्र की ताकत से ही बहुमत की सत्ता पाई है | ऐसे में हिंदी के प्रति अदूरदर्शी निर्णय की वजह से सरकार आने वाले समय में सत्ता गवां भी सकती है|

Thursday, 24 July 2014

अधीनता

अधीनता से मुक्ति एवं अधीन बनाने का सुख आह्लादकारी होता है|

Wednesday, 23 July 2014

मानवीयता

 मानवीयता स्वयं का सृजित गुण है जो संकीर्णता के बरक्स व्यापकता लाती है, न्यूनतम में भी संतुष्टि का भाव उत्पन्न करती है,स्वयं एवं पर से स्वार्थ रहित प्रेम करना सिखाती है|

Tuesday, 22 July 2014

फेसबुक

फेसबुक पर अभिव्यक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण अंदर की वह आग है जो जीवन-जगत के हर मोड़ पर विपरीत से विपरीत स्थितियों के बीच भी अपनी दृढ़ता एवं सकारात्मकता के साथ अभिव्यक्त होनी चाहिए|

लेखन

लेखन से ज्यादा महत्वपूर्ण लिखने के क्रम में संवेदनशील व मानवीय हो जाना है|

Monday, 21 July 2014

ज्ञान

जीवन में ज्ञान संसार से और दृष्टि स्वयं से मिले तभी जन्म सफल है|

हिंदी आलोचना

अधिकांश हिंदी आलोचना या तो प्रशस्ति के रूप में या निंदा के रूप में लिखी जा रही है| हिंदी आलोचक में सम्यक दृष्टि का अभाव उत्पन्न होना हिंदी साहित्य की दुर्गति का ही प्रतीक है| 

अधीनता

जैसे ही आप किसी की अधीनता स्वीकार कर लेते हैं, आप अपनी बुधिमत्ता खो देते हैं|

जीवन का समभाव

प्रकृति की तरह अँधेरे और उजाले के समभाव में ही जीवन की परिपूर्णता निहित है|

हिंदी भाषा

हिंदी भाषा सहज,सरल,सटीक व मर्म स्पर्शी शब्दों के विपुल भंडार की सार्थक एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति से अनायास ही दिल की भाषा का स्थान ले लेती है| इस वजह से भी हिंदी भाषा वक्ता एवं श्रोता में भावात्मक तारतम्य स्थापित कर प्रभावशाली भूमिका का निर्वाह करती है|   

Sunday, 20 July 2014

भारतीय सिनेमा

भारतीय सिनेमा ने एक दौर में बेहतरीन फ़िल्में दीं, बेहतरीन गीत,बेहतरीन कहानी और बेहतरीन कलाकार दिए | अब भारतीय सिनेमा ने हमारे बेहतरीन सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को भी हमसे छीन लिया है| एकाध फिल्मों को छोड़ दें तो भारतीय सिनेमा के लिए यह पतन का दौर है, न फ़िल्में टिक पा रही हैं, न कथावस्तु, न गीत-संगीत, न ही अच्छी व संवेदनशील विषयों पर पैसा लगाने वाले निर्माता एवं फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक ही बचे हैं| कुल मिलाकर फ़िल्मी दुनिया एक ऐसा व्यवसाय बन गया है जिसमें मुनाफा तो ज्यादा है पर सामान बहुत ही घटिया| 

भारतीय पत्रकारिता

भारतीय पत्रकारिता के बड़े हिस्से ने अपने दोहरे मानदंड की वजह से पत्रकारिता की गुणवत्ता के सूचकांक को अपने निम्नतर स्तर पर पहुंचा दिया है| मीडिया की आत्मा में फ़िल्मी एवं क्रिकेटी काया प्रवेश कर गई है और वही उसके आदर्श हो गए हैं | अधिकांश पत्रकारिता की जुबान पर सत्यता ,संवेदनशीलता, निर्भीकता की जगह राजनीति चढ़ गई है| पत्रकारिता ने ख़बरों को मसालेदार बनाने की कवायद में खुद को ही हास्यास्पद बना लिया है|  भारतीय पत्रकारिता के लिए यह दृष्टिहीनता का दौर है| भारतीय पत्रकारिता अपने पुनर्मूल्यांकन से अगर स्वयं को परिमार्जित कर पाई और स्वयं को विश्व स्तरीय बना पाई तभी अपना वजूद बचा पाएगी| अन्यथा जनता की नजर में पत्रकारिता टी वी सीरियल की वह कहानी बन कर रह गई है जिसमें रस तो बहुत है पर अर्थ नहीं है| 

Saturday, 19 July 2014

वीभत्स घटनाएँ

वीभत्स घटनाएँ पुलिस की लापरवाही के साथ-साथ गिरते सामाजिक मूल्य, राजनीतिक व प्रशासनिक दोहरापन , ढहती न्याय व्यवस्था, जीवन का आर्थिक असमान अंतर एवं कानून के प्रति बेख़ौफ़पन का परिणाम है| 

सिनेमा

सिनेमा ने अपनी कथावस्तु से संभ्रांत वर्ग और आम वर्ग का भारी अंतर पैदा कर दिया है| सिनेमा यह कह कर नहीं बच सकता कि हम समाज को निरुपित करते हैं| दरअसल सिनेमा वास्तविक समाज को दर्शाने के साथ-साथ आभासी समाज निर्मित भी करता है| सिनेमा की कथावस्तु में एक वर्ग है जिसका पैमाना धन, ऐश्वर्य, कानून एवं सौन्दर्य का उपभोग है एवं  दूसरा वर्ग इससे वंचित है| संभ्रांत वर्ग के कुकर्मों पर पर्दा डालने की सामाजिक नियत ने कई बुराइयां पैदा की हैं | जबकि वंचित वर्ग सिनेमा के वैभव को आम जीवन में पाने के लिए बैचैन है,जिसके लिए वह कई बार सारी हदें पार कर जाता है| इन दो वर्गों के जीवन व आर्थिक मूल्यों की  टकराहट ,जीवन का असमान अंतर सामाजिक बुराईयों का प्रतिफल है| 

धर्म

धर्म जब स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करने का माध्यम बनेगा तभी आत्म विकास भी संभव है एवं जन विकास भी|

जीवन

जीवन के कुछ कष्ट आनंद बन जाते हैं और जीवन के ही कुछ सुख दुःख में तब्दील हो जाते हैं|

इंसानियत

बड़े से बड़ा पद और सम्मान व्यक्ति को आनंद दे सकता है पर समाज और लोक की नजर में इंसानियत का मूल्य इससे कहीं ज्यादा है क्योंकि पद और सम्मान व्यक्ति को समृद्ध करता है जबकि इंसानियत से समाज समृद्ध होता है|

वक्त के आगोश में

वक्त के आगोश में व्यक्ति का सिमटना तय है,परंतु वक्त के साथ सार्थक मुद्दे अवश्य जीवित रहते हैं| अगर व्यक्तिगत दुर्भावना से मुक्त होकर सार्थक मुद्दों पर चर्चा की जाए तो इससे स्वयं एवं समाज को बदलने,उसे सही दिशा देने में मदद मिलेगी|

व्यक्ति

व्यक्ति कई बार स्वयं को ही नहीं जान पाता और कई बार दूसरे को पहली नजर में ही पहचान लेता है|

शिक्षा की भाषा

शिक्षा की भाषा,विषय वस्तु,गुणवत्ता एवं सुविधा में अंतर अमीरी और गरीबी के बीच की गहरी खाई है,जिसे पाटना बहुत ही कठिन है| इसका परिणाम अखिल भारतीय परीक्षाओं में साफ़ दिखता है| अखिल भारतीय परीक्षाओं का मिजाज कान्वेंट स्कूलों के अनुकूल है और समृद्ध वर्ग को सहयोग करने वाला है| इसलिए अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व भारतीय भाषाओँ पर साफ़ दिखाई देता है | इसी वजह से अंग्रेजी भाषी तथा अन्य भाषा भाषी लोगों के जीवन का अंतर भारतीय समाज की कटु सच्चाई है| 

मिड डे मिल

मिड डे मिल पेट भरने के साथ-साथ भिखमंगापन भी विकसित कर रहा है| बचपन से ही हर एक चीज के लिए दूसरे का मोहताज बनने की भी शिक्षा दे रहा है|सरकार की आत्म निर्भर बनाने की ज्यादातर योजनाएं आत्म खोखलापन की शिकार हो गई हैं| सरकारी योजनाएं पेड़ लगाने वाली नहीं फल बाँटने वाली बन कर रह गई हैं| कभी लैपटाप,कभी साईकिल बांटकर जीवन की राह दिखाई जा रही है,पर इन योजनाओं में निरंतरता कितनी है| एकांगी योजनाओं के लाभ से कितने दिन घर में उजाला हो सकता है|यह भी विचारणीय प्रश्न है| जरुरत है राज्य/केंद्र स्तर पर बेहतर योजना के साथ एक किन्तु बड़ी और सार्थक योजना के कार्यान्वयन की|

हिंदी

हिंदी इस देश के असंख्य भूखे-नंगे,शोषित समाज के सुख-दुःख की अभिव्यक्ति की प्रभावशाली भाषा है|

शिक्षा रोजगार का पर्याय है

हमारे देश में शिक्षा रोजगार का पर्याय है|इसलिए शिक्षा से जुड़ने वाले अधिकांश बच्चों एवं अभिभावकों का ध्येय नौकरी हासिल करना है| ज्ञान की परवाह शिक्षक और सरकार को भी नहीं है| इसलिए डाक्टर,इंजीनियर,आई ए एस आदि बनाने कि फैक्ट्री इस देश में काम कर रही है और इन पदों को इतना दुरूह एवं कठिन बना दिया गया है कि इसमें गरीब आदमी का प्रवेश सबसे कम है| फिर शिक्षा का महत्त्व क्या है?अधिकांश सरकारी विद्यालयों में शिक्षा मिड डे मिल के जरिए पेट भरने का साधन मात्र है| जो बच्चे सरकारी स्कूल पहुँच गए हैं उनके शिक्षा का स्तर क्या है?देश की आधी आबादी वास्तविक शिक्षा से बेदखल है और यह गहरी साजिश है ताकि गरीब गरीब बने रह सकें ताकि कायम रह सके गरीबों का हक़ मारने का धंधा और चमकती रह सके देश की राजनीति|

विचारों की सीमा

विचारों की कोई सीमा नहीं होती|

पुराने घर का मोह

पुराने घर का मोह छूटने और नया घर को घर समझने में भी थोड़ा वक्त लगता है

हिंदी कर्मियों का स्वभाव

हिंदी कर्मियों का स्वभाव आत्म संघर्ष का है| चाटुकारिता,हीन भावना,अपनी भाषा को ही दोयम दर्जे का समझने के भाव ने हिंदी प्रतिभा को और भी कुंठित कर दिया है| इसलिए हिंदी की लडाई की चिंगारी भाषाई एकता के अभाव में और भी कमजोर हो गई है| रही सही कसर सरकारी कथनी और करनी ने पूरी कर दी है| ऐसे में जो हिंदी के एकलव्य शेष हैं वो अपना अंगूठा कटाकर करें भी तो क्या करें,जबकि हिंदी के मठाधीश के बोल तक बिके हों और माहौल विपरीत हो| 

अन्न की बर्बादी

अन्न की बर्बादी ने भी अन्नदाता को भी अन्न से महरूम कर दिया है|

देश की राजनीति

देश की राजनीति करने वाले दल की दरकार है,स्वयं के हित और विरोधियों के विपरीत राजनीति देश को गर्त में ले जा रही है|

कविता का कंठ खोना

कविता आत्म सौंदर्य का प्रस्फुटन है,जो धर्म,संस्कार की सीमा से परे एक अलौकिक सत्य है| कविता सामाजिक व सांस्कृतिक सत्य को उजागर करने का एक कारगर हथियार है जिसमें सोयी हुई सत्ता एवं आम जन को जगाने की अपार शक्ति है,परंतु जब से कविता राजनीतिक हो गई है अपना कंठ खो बैठी है| 

जीवन एक लंबी कतार

जीवन एक लंबी कतार ही तो है| जन्म से लेकर मृत्यु तक स्कूल में,बस में,ट्रेन में,नौकरी में,बैंक-पोस्ट आफिस में,राशन की दुकान में,पासपोर्ट बनाने में,अस्पताल में,वायुयान में,मेट्रो में लोग यंत्रवत कतार में लग जाते हैं| होड़ रहती है कि कैसे शिक्षा, नौकरी, अस्पताल.. हर जगह आगे निकल जाएँ| यह आगे निकलने की होड़ ही उर्जा भी है,जीवंतता भी है,मज़बूरी भी है और जीवन की अर्थवत्ता का खोना भी है|

हिंदी आजाद देश की गुलाम भाषा

हिंदी आजाद देश की गुलाम भाषा बनकर रह गई है| जिन राजनीतिक एवं प्रशासनिक जंजीरों में हिंदी जकड़ दी गई है उससे मुक्ति की राह हिंदी के नए महात्मा गाँधी पैदा करके ही पूरी की जा सकती है| दिल्ली में आंदोलनरत हिंदी प्रेमियों के प्रति आँखें मूंदे सरकारें एवं मीडिया सरोकार ने यह साबित किया है कि उनकी हर आवाज देश के ताकतवर को ही बुलंदी प्रदान करती है| गरीब,असहाय,शोषित,वंचित लोगों की तरह हिंदी को भी हासिए पर डालने की पुरजोर कवायद हो रही है| जब हिंदी आंदोलन की यह चिंगारी आग बनकर फैलेगी तभी हिंदी और हिंदी प्रेमियों की दशा सुधरेगी| सभी हिंदी प्रेमी अपने स्तर से हिंदी मुहिम को धार दें तभी हिंदी और इस देश के अधिसंख्य गरीब हिंदी भाषी लोगों के प्रति न्याय होगा जो वर्षों से अपनी ही रोजी रोटी की भाषा को अपने ही घर में बेइज्जत होते देखने को विवश हैं|

गुरु का कर्ज

गुरु शारीरिक रूप से भले मौजूद न हों,मन में वास तो उनका ही होता है| दृष्टि देने वाले गुरु महानतम व्यक्तित्व के धनी होते हैं| गुरु का कर्ज तभी अदा किया जा सकता है जब गुरु से प्राप्त लौ से आप किसी और का जीवन भी रोशन कर दें|

पुरस्कार

पुरस्कार कई बार व्यक्ति को खोखला कर देता है| अनुगृहित व्यक्ति पुरस्कार के बोझ तले इतना दब जाता है कि सच को झूठ और झूठ को सच समझने का आदी हो जाता है|

दिल्ली में चलाए जा रहे भाषाई आंदोलन

दिल्ली में चलाए जा रहे भाषाई आंदोलन को दिल्ली आंदोलन का नाम दिया जाना चाहिए क्योंकि दिल्ली सत्ता का प्रतीक है और अगर दिल्ली आंदोलन सफल हो गया तो देश की भाषाई विरासत समृद्ध होगी| दिल्ली आंदोलन की सफलता-असफलता देश में भाषा की नई तक़दीर भी लिखेगी | 'यूपीएससी' के बहाने अब दिल्ली आंदोलन भारतीय भाषाओँ की अस्मिता का आंदोलन भी बन चुका है| यह आंदोलन अंग्रेजियत मानसिकता को बदलने में कामयाब रहा तो आने वाले वक्त में वंचित लोगों की भाषा की समृधि से इस देश के आम नागरिक की समृधि सुनिश्चित होगी

साहित्य की गाड़ी

एक दूसरे की रचनाओं की वंदना की पटरी पर साहित्य की गाड़ी दौड़ रही है|

अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की विवशता

बेमेलदुरूह और अपनी भावभूमि से कटे अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की विवशता ने भी हिंदी की मौलिकता, सरलता 

एवं सहजता का हनन किया है| राजभाषा हिंदी और आम बोलचाल की हिंदी में बड़ा फर्क इसका उदाहरण है| बेमेल 

व निरर्थक अनुवाद की वजह से भी कई बार हिंदी भाषा उपहास का पात्र बन जाती है तथा अंग्रेजियत 

मानसिकता वाले लोगों को हिंदी भाषा को कमजोर आंकने का एक आधार मिल जाता है|

कवि होना

कवि होना धर्म,संप्रदाय,सीमा एवं वक्त से परे मानवीय होना है| कवि की दृष्टि की संपूर्णता में सृष्टि समाहित है

कवि का कथ्य आत्म कथ्य है| कवि की दायित्व घनघोर अँधेरे एवं तूफान में इंसानियत की लौ की रक्षा करना है

महिला रचनाकारों का सम्मान

महिला रचनाकारों का सम्मान साहित्य की जीवंतता का भी सम्मान है|

रचना

रचना का लक्ष्य अगर स्वयं हो तो स्वयं के साथ-साथ दूसरे के लिए भी वह सार्थक हो सकती है|

परछाईं

परछाईं कब हमारा साथ छोड़ती है पर हम आगे देखना बंद तो नहीं करते|

आत्मिक शक्ति

किसी बड़े और महान कार्य के लिए आत्मिक शक्ति ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है|

पिता का होना

पिता का होना आसमान का साथ होना है और माता का होना धरती का साथ होना है| जैसे धरती आसमान के बिना अधूरी है,वैसे ही माता-पिता का भी अकेले होना अधूरापन है| हमारे पैर धरती के सहारे बेशक मजबूती से चलें पर आसमान सिर पर न हो तो खुद के  चलने पर भी भरोसा कम हो जाता है| पिता का न होना इसी भरोसे को ताउम्र स्वयं में तलाशना है| 

सत्ता

सत्ता एक हथियार ही बन गई है,जब जिसके हाँथ आ जाए वही शहंशाह बन जाता है|

Friday, 18 July 2014

बलात्कार

बलात्कार एक घटना से ज्यादा घृणित मानसिकता है जो जगह एवं व्यक्ति के बदलने के साथ बदस्तूर जारी है| जब तक पीड़ित व्यक्ति का ओहदा देखकर कार्रवाई की जाती रहेगी तब तक बलात्कार का पूरी तरह से सफाया नामुमकिन है| बलात्कार की घटना कहीं की हो, किसी जाति-धर्म के साथ हो आवाज और प्रतिरोध का स्वर आसमान को छूना चाहिए| दूसरी अहम बात बेटी,बहु,माँ को जितनी इज्जत मिलनी चाहिए,क्या हमारा समाज उनता सम्मान उन्हें दे पाता है? नहीं न, जब उच्च सम्मान की भावना न समाज में है,न फिल्मों में,न मीडिया में,न न्याय व्यवस्था में तो ऐसे में बलात्कारी मानसिकता पर सतत गंभीरता कैसे संभव है?