हिंदी क्षेत्र में पैदा होना एवं हिंदी के स्वाभाविक माहौल में पढ़ना एवं समानता के तहत एक अदद नौकरी की आशा करना, आजाद भारत देश में क्या जुर्म है जिसकी आत्मा व संविधान में हिंदी भाषा पिरोई गई हो तथा एक ऐसी भाषा के विरोध में खड़ा हो जाना जो लंबे समय से देश की पराधीनता की भाषा की सूचक रही हो,क्या सचमुच अपराध है? हिंदी सहित भारतीय भाषा के प्रति दोहरापन देश की मानसिक दुर्बलता का ही परिचायक है| ऐसे समय में जब दुनिया के देश अपनी अस्मिता के लिए सबकुछ कुर्बान करने को तैयार हों ,हमारे नीति नियंता द्वारा अंग्रेजियत मानसिकता से अपनी भाषाई अस्मिता को ही कुर्बान कर देना दुनिया की नजर में हमें और भी हास्यास्पद बना देता है| जिन मुद्दों पर सरकार को स्वत: गंभीर कार्रवाई करनी चाहिए उन मुद्दों पर सड़कों पर बेगुनाहों का खून बहे और हम अपनी नीतियों की दुहाई देकर सच को सच कहने का साहस ही नहीं जुटा पा रहे हों, यह अपने आप में और भी दुर्भाग्यपूर्ण एवं निंदनीय है|
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