भारतीय सिनेमा ने एक दौर में बेहतरीन फ़िल्में दीं, बेहतरीन गीत,बेहतरीन कहानी और बेहतरीन कलाकार दिए | अब भारतीय सिनेमा ने हमारे बेहतरीन सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को भी हमसे छीन लिया है| एकाध फिल्मों को छोड़ दें तो भारतीय सिनेमा के लिए यह पतन का दौर है, न फ़िल्में टिक पा रही हैं, न कथावस्तु, न गीत-संगीत, न ही अच्छी व संवेदनशील विषयों पर पैसा लगाने वाले निर्माता एवं फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक ही बचे हैं| कुल मिलाकर फ़िल्मी दुनिया एक ऐसा व्यवसाय बन गया है जिसमें मुनाफा तो ज्यादा है पर सामान बहुत ही घटिया|
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