हिंदी कर्मियों का स्वभाव आत्म संघर्ष का है| चाटुकारिता,हीन भावना,अपनी भाषा को ही दोयम दर्जे का समझने के भाव ने हिंदी प्रतिभा को और भी कुंठित कर दिया है| इसलिए हिंदी की लडाई की चिंगारी भाषाई एकता के अभाव में और भी कमजोर हो गई है| रही सही कसर सरकारी कथनी और करनी ने पूरी कर दी है| ऐसे में जो हिंदी के एकलव्य शेष हैं वो अपना अंगूठा कटाकर करें भी तो क्या करें,जबकि हिंदी के मठाधीश के बोल तक बिके हों और माहौल विपरीत हो|
No comments:
Post a Comment