कालेज एवं विश्वविध्यालय में अध्यापक की नौकरी रेवड़ी की तरह बाँटने की परंपरा चल पड़ी है| अध्यापक जब जोड़ तोड़ कर कालेज पहुंचेंगे तो वे शिक्षा एवं शिक्षार्थी की गुणवत्ता का क्या हश्र करेंगे यह विचारणीय प्रश्न है? इस अराजकता के खिलाफ अधिकांश विद्वानों में मौन स्वीकृति है क्योंकि ले दे कर इन वुधिजीवियों के पास यही ताकत बची है कि अपने चहेतों को कैसे वैतरणी पार करा दे,फिर उनके मुख से न्याय-अन्याय की बात सुनना बेमानी है| शिक्षा की अर्थी निकालने में विश्वविद्यालय के बिके हुए वुधिजीवियों एवं शिक्षा माफिया ही सबसे आगे है,जहाँ जाति,धर्म,पैसे,बल के आधार पर डिग्री से लेकर नौकरी तक सहज उपलब्ध है|
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