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Saturday, 19 July 2014

सिनेमा

सिनेमा ने अपनी कथावस्तु से संभ्रांत वर्ग और आम वर्ग का भारी अंतर पैदा कर दिया है| सिनेमा यह कह कर नहीं बच सकता कि हम समाज को निरुपित करते हैं| दरअसल सिनेमा वास्तविक समाज को दर्शाने के साथ-साथ आभासी समाज निर्मित भी करता है| सिनेमा की कथावस्तु में एक वर्ग है जिसका पैमाना धन, ऐश्वर्य, कानून एवं सौन्दर्य का उपभोग है एवं  दूसरा वर्ग इससे वंचित है| संभ्रांत वर्ग के कुकर्मों पर पर्दा डालने की सामाजिक नियत ने कई बुराइयां पैदा की हैं | जबकि वंचित वर्ग सिनेमा के वैभव को आम जीवन में पाने के लिए बैचैन है,जिसके लिए वह कई बार सारी हदें पार कर जाता है| इन दो वर्गों के जीवन व आर्थिक मूल्यों की  टकराहट ,जीवन का असमान अंतर सामाजिक बुराईयों का प्रतिफल है| 

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