भारतीय पत्रकारिता के बड़े हिस्से ने अपने दोहरे मानदंड की वजह से पत्रकारिता की गुणवत्ता के सूचकांक को अपने निम्नतर स्तर पर पहुंचा दिया है| मीडिया की आत्मा में फ़िल्मी एवं क्रिकेटी काया प्रवेश कर गई है और वही उसके आदर्श हो गए हैं | अधिकांश पत्रकारिता की जुबान पर सत्यता ,संवेदनशीलता, निर्भीकता की जगह राजनीति चढ़ गई है| पत्रकारिता ने ख़बरों को मसालेदार बनाने की कवायद में खुद को ही हास्यास्पद बना लिया है| भारतीय पत्रकारिता के लिए यह दृष्टिहीनता का दौर है| भारतीय पत्रकारिता अपने पुनर्मूल्यांकन से अगर स्वयं को परिमार्जित कर पाई और स्वयं को विश्व स्तरीय बना पाई तभी अपना वजूद बचा पाएगी| अन्यथा जनता की नजर में पत्रकारिता टी वी सीरियल की वह कहानी बन कर रह गई है जिसमें रस तो बहुत है पर अर्थ नहीं है|
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