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Thursday, 14 August 2014

चाय वाले की हैसियत व रुतबा

ऐसे समय में जब राजनीतिक अपच के शिकार एकांगी विचारधारा के लोग उजाले में भी अँधेरे तलाशने के आदि हो गए हों और पिछली सरकार की खामियों को भूलकर नई सरकार के माथे सी सबकुछ मढने को आतुर हों| उनके लिए प्रधानमंत्री जी का साहस व संकल्प भरा मौखिक संदेश बेचैनी पैदा करने वाला है | शब्द लिखे हों या मौखिक असर पैदा करते हैं बशर्ते उस शब्द के पीछे का चेहरा आस पैदा करता हो और काफी समय बाद आज लालकिला अपने रंग में दिखा| मुझे पूरा विश्वास है दुनिया में इस कदम का सकारात्मक प्रभाव जाएगा और प्रधानमंत्री जी के कहे को सरकार सच साबित कर पाई तो अगला 15 अगस्त नई उपलब्धियों से गौरवान्वित हो सकता है| चाय वाले की हैसियत व रुतबा आक्सफोर्ड से बढ़कर भी दिखी| 

Tuesday, 12 August 2014

राजनीतिक प्रसव पीड़ा

किसी भी देश की राजनीतिक प्रसव पीड़ा नए युग का आगाज हो सकती है जो दृष्टिहीनता की वजह से प्रजातांत्रिक गर्भपात का शिकार हो जाती है|

Sunday, 10 August 2014

जीवन

जीवन की नदी में जब विवेक - बुद्धि के पतवार से मन व विचार की नाव खेवी जाती है तब प्रतिकूल धाराओं में भी चलना सहज लगता है अन्यथा जीवन समय की धारा की कठपुतली बन कर रह जाता है| 

भ्रम व मायाजाल

भ्रम व मायाजाल का चश्मा जब उतरता है तो हकीकत अपने घृणित व असहनीय रूप में सामने आती है|

Monday, 4 August 2014

मोदी जी की नेपाल यात्रा

नेपाल को छोटे राष्ट्र के रूप में तबज्जो न देना भारत सरकार की भूल थी जिसे मोदी जी ने अपनी यात्रा के माध्यम से सुधारने की पुरजोर व सराहनीय कोशिश की है| नेपाल अवैध व्यापार व आतंकवाद का बड़ा रास्ता है| अगर नेपाल एवं भारत सरकार संबंध सुलझने के साथ-साथ इन गंभीर मुद्दों पर सार्थक कार्य करें तो चीन,बर्मा,बांग्लादेश आदि देशों के संबंधों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा जिससे भारत को कुटनीतिक सफलता के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी होगा एवं सीमांत लोगों का जीवन स्तर भी सुधरेगा| 

Sunday, 3 August 2014

भारतीय ओलंपिक संघ

भारतीय ओलंपिक संघ शतरंज के खिलाड़ी की तरह अपने खिलाड़ियों के कैरियर से खेलता रहता है और जो प्रतिभाशाली खिलाड़ी पसंद नहीं आते उसे प्यादे की तरह दरकिनार कर दिया जाता है| अपने चहेते खिलाड़ियों के हिसाब से नए नियम बना दिए जाते हैं| बावजूद इसके विपरीत स्थिति में हमारे खिलाड़ी देश का नाम रौशन करते रहते हैं परंतु जिस देश में खेल को दिशा दिखाने वाले खिलाड़ी की जगह व्यवसायी एवं नेता होंगें उस देश का खेल भविष्य और देश के खेल की बुनियादी सुविधाओं एवं खिलाड़ियों की प्रतिभावों से खिलवाड़ ही होता रहेगा| ऐसे में पदाधिकारी रंगरेलियां मानते पकड़े जाएँ तो कोई ताज्जुब नहीं है|

बाढ़ से उजड़ता जीवन

बिहार-उत्तर प्रदेश की उफनती नदियों की वजह से हर साल होने वाले मौत के तांडव एवं बाढ़ से घर बार व जान-माल सहित पलायन यह साबित करता है कि आजादी के छ दशकों के बाद भी सरकार को गरीब लोगों की जान की कोई खास परवाह नहीं है| न ही अंधी विकास के रास्ते हम प्रकृति से सामंजस्य ही स्थापित कर पाए हैं| इसके बरक्स बाढ़ की विभीषिका राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट बैंक का साधन, पूंजीपतियों के लिए पुनर्निमाण के नाम पर और अफसरों के लिए योजनाओं के नाम पर लूट का साधन मात्र बन कर रह गया है| 

Saturday, 2 August 2014

हिंदी के समसामयिक प्रश्नों से बेखबर

दिल्ली में हिंदी के समसामयिक प्रश्नों से बेखबर छपास व प्रसिद्धि रोग से पीड़ित कुछ हिंदी कवियों, रचनाकारों, आलोचकों व बुद्धिजीवियों की ऐसी जमात है जो वक्त से इतर अर्थहीन व मृतपाय कविताओं, रचनाओं व आलोचनाओं की अर्थी सजाने एवं एक दूसरे की मरी हुई भावनाओं को जिंदा व ताजा बनाए रखने के लिए एक सभा से दूसरी सभा भागते रहते हैं| जो आसपास के दुर्गंध, सड़ी-गली व्यवस्था व हिंदी के लिए चलाए जा रहे आंदोलन आदि से वास्ता न रखते हुए काल्पनिक दुनिया में स्वयं को महफूज रखे हुए हैं| स्वयं के लेखन को अमरत्व देने के लिए नाख़ून भी नहीं शहीद करने वाले लेखकों, कवियों, आलोचकों, बुद्धिजीवियों को न समय माफ़ करेगा न याद रखेगा|   

प्रेमचंद

प्रेमचंद शोषित जनों के मुखर आवाज थे| दुनिया को प्रेमचंद ने आम जन के सुख-दुःख को देखने का नया नजरिया दिया | आज प्रेमचंद जैसी संवेदना व प्रभाव पैदा करने वाले रचनाकार नहीं हैं| इसलिए भी गरीबों के प्रति समझ कम हो गई है| 

अंग्रेजी की वकालत

अंग्रेजी की वकालत करने वाले अधिकांश लोग यह भूल जाते हैं कि उनकी पिछली पीढ़ी ने हिंदी और भारतीय भाषा व संस्कृति की वकालत करके ही आजादी हासिल की है जिस आजादी में फक्र के साथ वे अंग्रेजियत मानसिकता के शिकार हो गए हैं| 

Friday, 1 August 2014

यूपीएससी का भाषाई आधार

यूपीएससी में भाषाई आधार पर समान अवसर उपलब्ध न करा पाना सरकार की इच्छाशक्ति का अभाव एवं आमजन व गरीबों की भाषा का मजाक उड़ाना है जिसे बेवजह भारतीय भाषाओँ के प्रतियोगियों के पिछड़ेपन के रूप में इंगित किया जा रहा है| साजिश के तहत अंग्रेजी के बरक्स पहले अपनी भारतीय भाषाओँ को कमजोर हो जाने दिया गया, फिर उसे अनुवाद के जरिए बोझल बना दिया गया और अब उसे और उससे जुड़े प्रतियोगियों को अर्थहीन मनाकर किनारे किया जा रहा है| भारतीय भाषाओँ की यह लडाई इसलिए भी अहम है कि यह प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओँ की अस्मिता की भी लडाई है| ऐसे में यह कहना भी लाजमी होगा कि भैस का दूध(अंग्रेजी) पीने वाला एवं गाय का दूध(भारतीय भाषाओँ) पीने वालों में अंतर समझना एक कोरी मूर्खता ही है| दोनों को समान अवसर देना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि हमारे देश में शिक्षा का स्तर एवं माध्यम समान नहीं है| बावजूद इसके भारतीय भाषा के गरीब प्रतियोगी अपनी मेधा,परिश्रम एवं प्रतिकूल स्थितियों में परचम लहरा कर अपना स्तुत्य योगदान दे रहे हैं जो कि देश के लिए गर्व का विषय है| अंग्रेजी माध्यम से कितने गरीब घर के बच्चे यूपीएससी कर पाए हैं यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए? सवाल यह भी है कि क्या ऐसी परीक्षा प्रणाली लागू की जाए जिससे भारतीय भाषाओँ में अध्ययन करना जुर्म साबित हो जाए और अंग्रेजी का ज्ञान वरदान? यह हास्यास्पद है कि आजतक हम अपनी ही भाषा को सम्मान नहीं दे पाए, समान अवसर उपलब्ध नहीं करा पाए, मानसिक गुलामी से उबर नहीं पाए, साझा भाषाई संस्कृति की कद्र नहीं कर पाए तो हम आने वाले वक्त में क्या मिसाल गढ़ पाएंगे?  

सरकार

सरकार हिंदी भाषियों के फायदे के लिए नहीं अपने फायदे के लिए काम करती है| कोई सरकार को समझा दे कि हिंदी के हित से सरकार को बड़ा फायदा होगा या हिंदी बड़ा नुकसान कर सकती है तो सरकार पेट्रोल,डीजल की तरह आधी रात से हिंदी के हित में प्रावधान लागू कर दे| 

अच्छे दिन

अच्छे दिन सरकार के आए हैं जनता के नहीं| जनता को शोषण,महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, अत्याचार एवं अस्थिर वक्त की अंधी सुरंग में धकेल दिया गया है जहाँ अच्छे दिन के सपने आ सकते हैं पर अच्छे दिन नहीं | हाँ एकाध रोशनी टिमटिमाकर अच्छे दिन का आभास करा जाए तो ये और बात है|