बिहार-उत्तर प्रदेश की उफनती नदियों की वजह से हर साल होने वाले मौत के तांडव एवं बाढ़ से घर बार व जान-माल सहित पलायन यह साबित करता है कि आजादी के छ दशकों के बाद भी सरकार को गरीब लोगों की जान की कोई खास परवाह नहीं है| न ही अंधी विकास के रास्ते हम प्रकृति से सामंजस्य ही स्थापित कर पाए हैं| इसके बरक्स बाढ़ की विभीषिका राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट बैंक का साधन, पूंजीपतियों के लिए पुनर्निमाण के नाम पर और अफसरों के लिए योजनाओं के नाम पर लूट का साधन मात्र बन कर रह गया है|
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