यूपीएससी में भाषाई आधार पर समान अवसर उपलब्ध न करा पाना सरकार की इच्छाशक्ति का अभाव एवं आमजन व गरीबों की भाषा का मजाक उड़ाना है जिसे बेवजह भारतीय भाषाओँ के प्रतियोगियों के पिछड़ेपन के रूप में इंगित किया जा रहा है| साजिश के तहत अंग्रेजी के बरक्स पहले अपनी भारतीय भाषाओँ को कमजोर हो जाने दिया गया, फिर उसे अनुवाद के जरिए बोझल बना दिया गया और अब उसे और उससे जुड़े प्रतियोगियों को अर्थहीन मनाकर किनारे किया जा रहा है| भारतीय भाषाओँ की यह लडाई इसलिए भी अहम है कि यह प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओँ की अस्मिता की भी लडाई है| ऐसे में यह कहना भी लाजमी होगा कि भैस का दूध(अंग्रेजी) पीने वाला एवं गाय का दूध(भारतीय भाषाओँ) पीने वालों में अंतर समझना एक कोरी मूर्खता ही है| दोनों को समान अवसर देना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि हमारे देश में शिक्षा का स्तर एवं माध्यम समान नहीं है| बावजूद इसके भारतीय भाषा के गरीब प्रतियोगी अपनी मेधा,परिश्रम एवं प्रतिकूल स्थितियों में परचम लहरा कर अपना स्तुत्य योगदान दे रहे हैं जो कि देश के लिए गर्व का विषय है| अंग्रेजी माध्यम से कितने गरीब घर के बच्चे यूपीएससी कर पाए हैं यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए? सवाल यह भी है कि क्या ऐसी परीक्षा प्रणाली लागू की जाए जिससे भारतीय भाषाओँ में अध्ययन करना जुर्म साबित हो जाए और अंग्रेजी का ज्ञान वरदान? यह हास्यास्पद है कि आजतक हम अपनी ही भाषा को सम्मान नहीं दे पाए, समान अवसर उपलब्ध नहीं करा पाए, मानसिक गुलामी से उबर नहीं पाए, साझा भाषाई संस्कृति की कद्र नहीं कर पाए तो हम आने वाले वक्त में क्या मिसाल गढ़ पाएंगे?
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