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Tuesday, 26 December 2017

इंसान

बड़ा आदमी होकर छोटा इंसान बनने से बेहतर है छोटा आदमी रहकर बड़ा इंसान बनना।

संवेदनशीलता

जब किसी के पास असीम ताकत आ जाती है तब उसका मूल्यांकन उसकी ताकत की वजह से नहीं बल्कि उसकी संवेदनशीलता की वजह से की जानी चाहिए।

Tuesday, 19 December 2017

रिश्ता

कई बार हम जीवन के जिस मोड़ पर खड़े होते हैं वहाँ से हमें रिश्तों को आगे देखने की जरूरत होती है और हम पीछे मुड़ कर साथ छोड़ने वाले साथी को देखते रह जाते हैं।

Sunday, 17 December 2017

बेमानी

लड़ाइयों, नफ़रतों से गुज़रते हुए जब हम अपना जीवन युद्ध समाप्त कर रहे होंगे तब तक ये लड़ाइयां बेमानी हो चुकी होंगी और यह जीवन भी।

Saturday, 16 December 2017

अहंकार

यह समय अहंकार का समय है। सत्ता से राजनीति तक में अहंकार व्याप्त है। मीडिया में अहंकार की भाषा की प्रमुखता है। आलोचक भी आक्रामक हो गए हैं और सबसे ज्यादा नुकसान भी हमारे समाज को अहंकार से ही हो रहा है।

दिशाविहीन समाज

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने अपने महापुरुषों को प्रतीक मात्र में तब्दील कर दिया है और उनके सपनों एवं विचारों को भूल कर एक दिशाविहीन समाज की ओर अग्रसर हैं।

प्रतिभा

अगर प्रतिभा का सम्मान समाज न कर पाए तो दोष प्रतिभा का नहीं समाज का है।

ग़लत

ग़लत लोगों से सही की उम्मीद करना खुद को ही ग़लत ठहराना है।

भेड़चाल

शिक्षित व्यक्ति का विचार जब भेड़चाल का शिकार हो जाता है तब शिक्षा का मूल्य भी व्यर्थ हो जाता है।

वादा

खुद को किए वादे को निभाने की बजाय हम दुनिया से किए वादे निभाने में ही जिंदगी बिता देते हैं और फिर पछताते हैं कि जिंदगी ने हमें दिया ही क्या है?

व्यक्तित्व

जब आप किसी व्यक्ति विशेष का मूल्यांकन करते समय उसे किसी जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, वर्ग विशेष से जोड़ देते हैं तो उसके व्यक्तित्व को छोटा कर देते हैं।

कीमत

चंद लोगों के बेहिसाब दौलत, अय्याशी, वहशीपन की कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ती है।

ज़बान

कुछ लोगों की अपनी कोई ज़बान नहीं होती फिर भी वे बोलते बहुत हैं।

बीज

जब प्रतिकूल ऊर्जा का सदुपयोग करना आ जाता है तब असफलता में भी सफलता का बीज नज़र आता है।

Friday, 1 December 2017

आलोचना

जनता द्वारा चुनी हुई सरकार की सार्थक आलोचना की बजाय उसके प्रति घृणित विचारधारा रखना व्यक्तिगत कुंठा की पराकाष्ठा एवं जन भावनाओं का अपमान है।

Sunday, 26 November 2017

हिंसा

समाज में हिंसा इतनी सहज स्वीकार्य हो गई है कि अहिंसक लोग ही असहज महसूस करने लगे हैं।

दिखावा

दिखावा दोनों ही निंदनीय है चाहे वह अमीर होकर गरीब का हो या गरीब होकर अमीर का हो।

जातिवाद

जातिवाद आधारित ज्यादातर संघठन न तो खुद का हित कर पा रहे हैं न समाज का।

दुःख

दुःख तब नहीं होता जब कोई नहीं चलता बल्कि दुःख तब होता है जब कोई अपनी पूरी ताकत से चलता है और कोई उसे जबरन रोक देता है।

दृष्टि

कई बार परिस्थिति वश दृष्टि संकुचित हो जाती है जो परिस्थिति बदलने के वाबजूद व्यापक नहीं हो पाती।

Wednesday, 22 November 2017

व्यक्तित्व

जीवन की सफलता पद नहीं व्यक्तित्व है। इसलिए भी व्यक्तित्व की ऊंचाई के सामने पद की ऊंचाई बौनी साबित हो जाती है।

बच्चे

जीवन के पूर्वार्ध में हम बच्चों को समय नहीं दे पाते एवं उत्तरार्ध में बच्चे।

पूजा

जब आप किसी की पूजा करने लगते हैं तो उसके पापों को भी सहज स्वीकार कर लेते हैं।

हार

अपनी असीम क्षमता को पहचाने बिना छोटी-छोटी समस्याओं से घिरे रहने की मानसिक प्रवृति ही अक्सर हार का कारण बनती है।

दृष्टि

कई बार हम अपने जीवन में जो विचारों का चश्मा पहनते हैं उसे चाहे-अनचाहे कभी उतार ही नहीं पाते चाहे दृष्टि ही क्यों न खो जाए।

सम्मान

अगर प्रतिभा का सम्मान समाज न कर पाए तो दोष प्रतिभा का नहीं समाज का है।

खेल

कुछ लोग अपनी जिंदगी से खेल कर खुद को बर्बाद कर लेते हैं और कुछ लोग अपनी जिंदगी को खेल-खेल में व्यतीत कर लेते हैं।

सामंजस्य

आपके शब्द एवं अर्थ का आपके जीवन से भी सामंजस्य होना आवश्यक है अन्यथा सब व्यर्थ है।

सही

दूसरे को गलत साबित करने से ज्यादा जरूरी खुद को सही साबित करना है।

कद

अक्सर हम अपना कद बड़ा करने की बजाय दूसरे का कद कम करने में लगे रहते हैं और अंततः अपना ही कद कम कर लेते हैं।

Thursday, 28 September 2017

प्रतिदान

जब प्रेम प्रतिदान चाहता है तो खुद को छोटा कर लेता है।

Sunday, 13 August 2017

मानसिक सम्पन्नता

कई बार आर्थिक सम्पन्नता के वाबजूद मानसिक विपन्नता नहीं जाती और कई बार आर्थिक विपन्नता के वाबजूद मानसिक सम्पन्नता आ जाती है। 

मानसिक सम्पन्नता आर्थिक सम्पन्नता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण व मूल्यवान है और मानसिक सम्पन्नता मानव धर्म का पर्याय भी है जिसके लिए हृदय की उदारता व प्रेम अनिवार्य है।

रणक्षेत्र

जिंदगी के रणक्षेत्र में चाहने वाले भी हैं और वार करने वाले भी।
दोनों जरूरी हैं। दोनों का सम्मान जरूरी।

जिंदगी की पिच

जिंदगी की पिच पर अगर कोई ख़राब खेल रहा हो तो क्रिकेट की तरह उस वक्त अत्यंत कौशल एवं धैर्य से खेलने की जरूरत होती है ताकि उस संबंध की रक्षा की जा सके एवं जिंदगी की जंग को प्रेमपूर्वक व सम्मान सहित जीता जा सके।

पिता

जब तक पिता जीवन रथ के सारथी हैं तब तक संतान अपराजेय है।

प्रतिभा

जो प्रतिभा दबाव में निखरे वही सम्मान योग्य है।

भयावह सभ्यता

मन,वचन,कर्म से हम हिंसक समाज की ओर बढ़ते जा रहे हैं और जाने-अनजाने वैश्विक स्तर पर भयावह सभ्यता पाँव पसार रही है।

लेखन

लेखन
संजीदा लोगों की भाषा एवं सोच में भी पीत पत्रिकारिता घर करती जा रही है और लेखन प्रतिक्रियावादी होता जा रहा है जिससे विमर्श का स्वरूप संकुचित होता जा रहा है।

कुल मिलाकर लेखन सामंजस्यता के बरक्स दो गुटों के वैमनस्य का शिकार हो गया है।

नारी समाज

भारतीय समाज अपने तमाम प्रयत्नों के वाबजूद नारी को पूर्ण सुरक्षा व सम्मान देने में नाकाम ही रहा है और दुःखद यह भी कि नारी समाज स्वयं भी अपने आत्म सम्मान के प्रति पूर्ण जागरूक व संजीदा नहीं है। 

फासले

कुछ फासले सदियों के पल भर में तय हो जाते हैं
कुछ फासलों को तय करने में जीवन बीत जाता है|

भयावह समय

इस भयावह समय में अपने अंदर प्रेम व सम्मान बचाए रखना स्वयं के लिए एक बड़ी चुनौती है।

नाकाम

कई लोगों को सीमित शिक्षा के वाबजूद जिंदगी की कठिन परीक्षा में सफल होने का असीमित अनुभव होता है और कई लोग उच्चतम शिक्षा के वाबजूद जिंदगी में नाकाम हो जाते हैं।

वक्त

मान,अपमान,सम्मान की धुरी पर जिंदगी घूमती रहती है और वक्त काफ़ूर हो जाता है।

बड़बोलापन

बड़बोलापन भारतीय राजनीति की पहचान बनता जा रहा है। सभी पार्टियों में दम्भ भरने वाले कलाबाज हैं जो अंततः अपनी ही पार्टी का जड़ खोदते हैं।

तुच्छ

बिना बड़े संघर्ष के, बिना बड़ी चुनौतियों के जो कुछ भी हासिल होगा वह छोटा और तुच्छ ही होगा।।

लक्ष्य

जब आप अपनी कमियों की वजह से हारने लगते हैं तब साधारण एवं आसान लक्ष्य भी कठिन लगने लगते हैं।

राय

राय की विशेष चिंता नहीं करनी चाहिए, वह अक्सर बदलती रहती है चाहे खुद की हो, खुद के प्रति हो या दूसरे की।

हिन्दी समाज

कमोबेश हिन्दी समाज आत्ममुग्ध एवं संकुचित समाज में तब्दील होने की राह पर है। 

वैचारिक मतभेद

वैचारिक मतभेद का सम्मान करते हुए व्यक्तिगत संबंधों की प्रगाढ़ता बनाए रखना ही हृदय की विशालता है।

सहज

दबाव एवं अभाव में जो सहज रह लिया उसके लिए असहज कुछ भी नहीं।

दर्द

जिंदगी में कुछ लोगों का होना बेशक आनंदित न करता हो पर उनका न होना बेहिसाब दर्द जरूर देता है।

पक्षधरता

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों का बर्ताव पार्टी प्रवक्ता जैसा होता है। पक्षधरता को इतना धर लेते हैं कि मुद्दा सिरे से गायब हो जाता है।

कवि

कवि होना धर्म,संप्रदाय,सीमा एवं वक्त से परे मानवीय होना है| कवि की दृष्टि की संपूर्णता में सृष्टि समाहित है| कवि का कथ्य आत्म कथ्य है| कवि का दायित्व घनघोर अँधेरे एवं तूफान में इंसानियत की लौ की रक्षा करना है|

प्रेम

प्रेम का अर्थ यह नहीं अलग अलग लोगों में प्रेम ढूंढा जाए बल्कि हर स्तर पर हर मुश्किलात में भी प्रेम बनाए रखने के उपाय किए जाएं।

आवाज

खुद की बाँसुरी को किसी की आवाज का मोहताज न बनाएं।

अंतर्मन

बाहर चाहे कितना ही घना अंधेरा हो, अंतर्मन में उससे कहीं अधिक उजाले की क़ाबलियत होती है।

संबंध

संबंधों के उजाले और अंधेरे को समेकित रूप से निभाना ही संबंधों का सम्मान करना है।

फासला

कई बार बड़े लोगों से फासला रखना जरूरी हो जाता है, नजदीक आने पे वे छोटे लगने लगते हैं।

मानवीयता

यह भ्रम है कि उच्च पद की अनिवार्य विशेषता मानवीय होना भी है| मानवीयता स्वयं का सृजित गुण है जो संकीर्णता के बरक्स व्यापकता लाती है, न्यूनतम में भी संतुष्टि का भाव उत्पन्न करती है,स्वयं एवं पर से स्वार्थ रहित प्रेम करना सिखाती है|

रचना

रचना का लक्ष्य अगर स्वयं हो तो स्वयं के साथ-साथ दूसरे के लिए भी वह सार्थक हो सकती है|

कठिन समय

कठिन समय में सबसे जरूरी है खुद की निष्पक्षता को बरकरार रखते हुए सच कहने का साहस बचाए रखना।

धर्म

जब समाज अपने स्वार्थ के लिए पाप-पुण्य को सुविधानुसार परिभाषित करने लगता है तब धर्म अपना अर्थ खो देता है|

संतुलन

विचारों का संतुलन आवश्यक है जैसे ही आप किसी एक पक्ष की ओर झुक जाते हैं दूसरे पक्ष के प्रति जाने-अनजाने अन्याय करने लगते हैं।

विचार

विचार वे बड़े व मूल्यवान होते हैं जो व्यवस्था परिवर्तन में सहायक होते हैं न कि व्यक्ति केंद्रित विचार जो कि परस्पर घृणा- द्वेष  एवं पूर्वाग्रह पर ही आधारित होते हैं।
                               

मनुष्य

मनुष्य ऐसा प्राणी है जो सोचता कुछ है, बोलता कुछ है और करता कुछ और ही है। इसलिए किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करना अत्यंत कठिन है।
           

नैतिकता

जब किसी व्यक्ति या घटना की आलोचना में आपकी घृणा भी शामिल हो जाती है तब आप भी नैतिकता खोकर राम-रावण का अंतर मिटा देते हैं।
      

Sunday, 21 May 2017

साहित्य

साहित्य व्यक्ति की संवेदना का विकास कर उसे मनुष्यता के करीब लाता है और मनुष्यता का मूल्य सभी सामाजिक मूल्यों में सर्वोपरि एवं अर्थपूर्ण है।

प्रतीकात्मक सम्मान

महापुरुषों की प्रतिमा का सम्मान एक प्रतीकात्मक सम्मान है परंतु महापुरुषों के उच्च विचारों का सम्मान उनके प्रति सच्ची श्रद्धा व विश्वास है।

जिम्मेदारी

हर जिम्मेदारी अपने तरीके का सुख और दुःख दोनों लेकर आती है।

संबंध

संबंध को सीमित दायरे में देखना ही बंधन है अन्यथा वक्त की निरंतरता में यही संबंध प्रगाढ़ता का पर्याय बन जाता है।

उपलब्धि

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मनुष्य हो जाना है क्योंकि कई बार लोग बड़े-बड़े पद तो पा लेते हैं परंतु मनुष्यता खो देते हैं।

अनुयायी

अमूमन व्यक्ति अपनी विचारधारा से ज्यादा दूसरे से व्यक्तिगत संबंधों का सम्मान करने लगता है और अपनी स्वयं की दृष्टि खोकर अनुयायी बन जाता है।

सहृदयता

संबंधों की सहृदयता परस्पर प्रेम एवं द्वेष से परे ममत्व प्राप्त कर लेना है।

आभासी दुनिया

आभासी दुनिया में बहुत कुछ पाकर भी खुद को खोने की संभावना ज्यादा है।

असीम

असीम की भी एक सीमा होती है। अपने अनुभव व ज्ञान दृष्टि से हम अपने लक्ष्य तय कर पाते हैं।

माँ-पिता

माँ-पिता के आशीर्वाद से जीवन में सब कुछ है बस उनके लिए समय नहीं है।

प्रसन्नता

प्रसन्नता का संबंध पद-प्रतिष्ठा, धन-दौलत से कहीं ज्यादा मनःस्थिति से है और अच्छी मनःस्थिति के लिए प्रेम, शांति व संतुष्टि का भाव आवश्यक है।

Friday, 14 April 2017

दलित मानसिकता

दलित व्यक्ति नहीं बल्कि दलित मानसिकता का पुरजोर बहिष्कार करना आवश्यक है चाहे वह ओछपूर्ण मानसिकता किसी भी धर्म, जाति, सम्प्रदाय से क्यों न जुड़ी हो।

सम्मान

महापुरुषों की प्रतिमा का सम्मान एक प्रतीकात्मक सम्मान है परंतु महापुरुषों के उच्च विचारों का सम्मान उनके प्रति सच्ची श्रद्धा व विश्वास है।

Thursday, 13 April 2017

जिंदगी

जिंदगी को प्रतिक्रिया एवं प्रतिद्वंदिता का पर्याय बनाने से बेहतर है स्व प्रेम व उत्थान के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ समर्पित भाव से कर्मरत रहना।

ऊर्जा

ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग चाहे वह किसी नकारात्मक स्थिति से ही क्यों न उत्पन्न हो।

स्व-प्रोत्साहन

स्व-प्रोत्साहन से बड़ा कोई पुरुस्कार नहीं।

साहित्य

साहित्य व्यक्ति की संवेदना का विकास कर उसे मनुष्यता के करीब लाता है और मनुष्यता का मूल्य सभी सामाजिक मूल्यों में सर्वोपरि एवं अर्थपूर्ण है।

Sunday, 19 March 2017

कुत्सित मानसिकता

जो लोग किसी भी अर्थ में देश तोड़ने की कवायद कर रहे हों वो लोग ही देश के असली दुश्मन हैं चाहे वो नेता हों, बुद्धिजीवी हों या आतंकी, सबकी कुत्सित मानसिकता मानवता के लिए समान रूप से हानिकारक है।

मर्यादित दृष्टिकोण

स्त्री-पुरुष के प्रति समान मर्यादित दृष्टिकोण ही सभ्य समाज का परिचायक है|

अहमियत

कभी-कभी जिंदगी में दूसरे को ज्यादा अहमियत देने से उनकी नज़रों में खुद की अहमियत कम हो जाती है।

नैतिकता

नैतिकता की बातें करना उन्हें शोभा देती है जो खुद नैतिक हों।