अजीब राजनीति है देश कि दया दिखाने गरीब की झोपड़ी जाएंगे| फोटो के लिए ग़रीब के साथ सूखी रोटी खाएंगे| अमीरी का सपना दिखाकर गरीबों को बाटेंगे|जादुई तरीके से रातो-रात ग़रीबी दूर करने का वादा करेंगे| गरीबों की हत्या एवं आत्महत्या पर नकारात्मक राजनीति करेंगे| चुनाव में ग़रीब तक पहुँचने के लिए रात दिन एक कर देंगे और चुनाव के बाद ग़रीबी पर चिंतन करने विदेश जाएंगे लेकिन ग़रीबी दूर नहीं कर पाएंगे चाहे अकूत अवैध संपत्ति के लिए ख़ुद पर छापा पड़ जाए और जेल हो जाए|
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Thursday, 31 December 2015
Sunday, 27 December 2015
लेखन का औचित्य
जब लेखन प्रेमचंद सरीखे रचनाकारों की तरह किसी खास और बड़े मकसद के लिए छोटे से छोटे लोगों की जीवन शैली को केंद्रित करके चलता है तभी अमरत्व को प्राप्त होता है और लेखक बड़े मुद्दों के साथ जीते हुए बड़ा और सार्थक बन पाते हैं अन्यथा चाटुकारिता पूर्ण एवं एक-दूसरे की बैशाखी के साथ गुमराह लेखन गिरोह का शिकार बन कुंए के पानी सा ठहराव उत्पन्न करता है जिससे शायद ही जनमानस का गला तर हो| हिंदी में आजकल ड्राइंग रूम वाले ऐसे कवि, आलोचक, लेखक सक्रिय हो गए हैं जो आपस में एक-दूसरे की पूंछ पकड़ कर जी रहे हैं और पुरुस्कार का तमगा भी पाने में कामयाब हो रहे हैं| ऐसे लेखक को हिंदी का अभिशप्त लेखक कहा जा सकता है|
Thursday, 24 December 2015
छद्म देशद्रोह
कई बार छद्म देशद्रोह आतंकवाद, देशद्रोह से ज्यादा ख़तरनाक साबित होता है क्योंकि नकारात्मकता स्वार्थलोलुपता के साथ मिलकर बहुत तेजी से जनमानस में व्याप्त हो जाती है और इसे फ़ैलाने में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे लोग क्षुद्र लाभ के लिए शामिल होते हैं व वैमनस्य का वातावरण तैयार कर आपसी सौहार्द को कायम नहीं होने देते|
Saturday, 28 November 2015
सहिष्णु-असहिष्णु
जन्म देने वाला पिता अपने बच्चे की परवरिश करते-करते, उसके सपनों को संजोते -संजोते अगर अपने बच्चे की किसी बात पर नाराज हो जाएँ तो वह पुत्र की नज़र में असहिष्णु हो जाते हैं |
उस असहिष्णु पुत्र के सिर से जब पिता का साया उठ जाता है तब वही पिता सहिष्णु लगने लगते हैं|
Tuesday, 24 November 2015
मुद्दा बनाम व्यक्ति
मुद्दे का समर्थन या विरोध जब व्यक्ति के समर्थन एवं विरोध में तब्दील हो जाता है तब भेड़ मानसिकता जन्म लेती है जो व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंदगी-नापसंदगी की वजह से कुतर्क का सहारा लेकर मुद्दे को हासिए में डाल देती है|
Thursday, 19 November 2015
Thursday, 12 November 2015
धारा
धारा के विपरीत तैरना साहस का कार्य है परंतु हर बार धारा के विपरीत ही तैरते रहना मूर्खता की निशानी है|
Monday, 9 November 2015
राजनीति की दूकान
जब से राजनीति में जीतने एवं हारने के खेल में अपनों का योगदान महत्वपूर्ण हो गया है तब से राजनीति की दूकान में हर बंदा पहलवान हो गया है|
Sunday, 25 October 2015
Friday, 16 October 2015
मंथरा एवं शकुनि
राम-रावण एवं कौरव-पांडव के युद्ध में सत्ता पराजित हुई किंतु मंथरा एवं शकुनि से सभ्यता, संस्कृति एवं शांति आहत हुई| इसलिए मंथरा एवं शकुनि जैसी ओछी मानसिकता को दरकिनार करके ही परस्पर प्रेम व भाईचारा को जिंदा रखा जा सकता है|
Sunday, 4 October 2015
नेतृत्व
कुशल,संवेदनशील एवं दूरदर्शी नेतृत्व की कमी प्रशासन,राजनीति की खामी के रूप में उभर रही है| एक तपा एवं दर्द से गुजरा हुआ समाज द्वेष की चिंगारी मात्र से दो खेमों में बंट जाता है| अपार संभावनाओं से भरी सामाजिक दृष्टि व सोच राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छा शक्ति के अभाव में संकुचित होने लगती है| भटकी हुई विचारधाराओं के तले मानवता बौनी होती जाती है| हजारों वर्षों के प्रेम पर पल भर की नादानी भारी पड़ने लगती है| जाने-अनजाने आम जनता इस बहसीपन का शिकार हो जाती है और गुनाहगार जिंदा रह जाता है हम सब में| मुमकिन है शांति पर वह अशांत है हमारे मन में|
संबंध
सभी संबंधों की अपनी सीमाएं हैं| हर संबंध को नाम दे देने से आप उसकी अच्छाईयों
एवं बुराईयों में बंध जाते हैं| कई बार उसको ढ़ोते-ढ़ोते दम घूंटने लगता है| संबंधों की गरिमा को बचाए रखने के लिए बेहतर है
कुछ संबंधों को सिर्फ अनाम रखा जाए, आत्मिक रखा जाए, असीम रखा जाए ताकि पूर्ण प्रेम, सजगता एवं शिद्दत से उसे निभाया जा सके| उसकी उर्जा को समाज में कलुषित होने से बचाया जा
सके| वक्त के उस पार उसे जिंदादिली
से जिंदा रखा जा सके जहाँ जाकर संबंध अक्सर खो जाते हैं|
Saturday, 3 October 2015
Monday, 21 September 2015
वक्त का पिजड़ा
आसमान में उड़ती हुई जिंदगी जब वक्त के पिजड़े में कैद हो जाती है तो साहस का पंख फैलाना भी भूल जाती है|
Sunday, 20 September 2015
तुलनात्मकता
तुलनात्मकता अक्सर निराश करती है चाहे वह व्यक्ति से हो, संबंधों से हो,शहर से हो| बेहतर है स्वयं के भरोसे को मजबूत किया जाए|
Tuesday, 1 September 2015
जिंदगी का सफ़र
जिंदगी का सफ़र इसलिए स्थगित नहीं किया जा सकता कि समय ख़राब है क्योंकि संभव है समय बदल जाए परंतु खतरा है कि जीवन ही न चूक जाए| इसलिए बेहतर है हर हाल में पूरी मुस्तैदी के साथ आगे बढ़ते रहना|
Wednesday, 26 August 2015
भाव बोध का आरक्षण
संपन्न वर्ग द्वारा बलपूर्वक सधिकार आरक्षण की मांग उस पुरानी वर्ण व्यवस्था को ही पोषित करता है जो यह मानता है कि श्रेष्ठ पर उसका ही अधिकार है तभी तो आरक्षण समानता के अधिकार की मूल भावना से निकलकर शक्तिशाली वर्ग द्वारा पुन: स्वयं को असमान करने की पुरजोर कोशिश बन गई है परंतु ऐसे में वर्तमान आरक्षण प्रणाली के महती दुरूपयोग एवं सामाजिक भेदभाव के शिकार व वंचितों तक लाभ न पहुँचने के दुष्परिणाम को अनदेखा नहीं किया जा सकता अन्यथा आरक्षण राजनीतिक हथियार के रूप में देश व समाज के लिए नासूर की तरह बना रहेगा| जिसकी वजह से युवा पीढ़ी भाव बोध व व्यवहार के स्तर पर भी स्वयं को बंटा हुआ एवं गुमराह महसूस करती रहेगी|
Wednesday, 19 August 2015
Sunday, 16 August 2015
प्रगतिशीलता बरक्स मोह
वर्तमान की आलोचना जब अतीत और भविष्य को दरकिनार कर की जाती है तब वह कुतर्क में तब्दील हो जाती है|ऐसे में राजनीतिक दृष्टिदोष वाले विचारक प्रगतिशीलता की जगह मोह को केंद्र बिंदु में लाकर स्वयं के विचारों को और भी हास्यास्पद बना लेते हैं|
Friday, 14 August 2015
विचार
किसी व्यक्ति विशेष या दल की हर बात की निंदा या प्रशंसा करने वाला व्यक्ति अपनी गुलाम मानसिकता का परिचय देता है और स्वयं के विचारों का ही हनन करता है|
Friday, 7 August 2015
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जब राजनीतिक स्वार्थ में तब्दील हो जाती है तब देश हित के मुद्दे ताक पर रख दिए जाते हैं|
Tuesday, 4 August 2015
दीपक
एक जलते दीपक से सभी बुझे दीपक रोशन हो सकते हैं,परंतु जो दीपक सदियों से अँधेरे में रहने की वजह से अँधेरे को ही स्वर्ग एवं आनंद का द्वार समझते हों वे कोशिश करते हैं कि जलता हुआ दीपक भी बुझ कर उन जैसा ही हो जाए लेकिन वे भूल जाते हैं कि एक जलता हुआ दीपक कभी-कभी अपने उजाले से पूरे संसार को आलोकित कर देता है|
Wednesday, 24 June 2015
भ्रष्टाचार का रूप
जब शीर्ष पद पर आसीन महिलाओं द्वारा भ्रष्टाचार की खबरें सामने आती हैं एवं उन खबरों पर बड़ी बेशर्मी से जब आरोपी या दल बचाव करते हैं तब यह समझ में आता है कि राजनीतिक एवं आर्थिक हवस ने किस हद तक नैतिकता,ईमानदारी को अपने वश में कर लिया है| जिस निडरता एवं मुखरता से भ्रष्ट महिलाएं भी अपने बचाव में सामने आ रही हैं उससे यह प्रकट होता है सत्ता लोलुपता एवं बेशर्मी भ्रष्ट पुरुषों के साथ-साथ भ्रष्ट महिलाओं की भी पहचान बनती जा रही है|
Saturday, 20 June 2015
ख़ुशी
ख़ुशी जब दूसरे पर अवलंबित होती है तो कई बार उदास कर जाती है | ख़ुशी जब अंतर्दृष्टि का स्वभाव बन हर पल साथ होती है तो मन को आह्लादित व अचंभित कर जाती है| प्रत्येक कार्य प्रेम का प्रस्फुटन बन जाता है और जीवन असीम आनंद का पर्याय|
Friday, 19 June 2015
कीचड़ और कमल
कीचड़ में कमल सुशोभित होता है परंतु वही कीचड़ जब कमल पर पड़ जाता है तो कमल अपना सौंदर्य खो बैठता है| कमल और कीचड़ के बीच जो महीन अंतर है वही प्रेम और घृणा का कारण है|
Tuesday, 16 June 2015
दृष्टि
जिनके पास आँख नहीं है वे अपनी ऊंगलियों के स्पर्श से ज्ञान व दृष्टि अर्जित कर लेते हैं और जिनके पास आँख और ऊंगलियाँ दोनों हैं वे कई बार अज्ञानवश अपनी दृष्टि खो देते हैं|
Monday, 15 June 2015
Sunday, 31 May 2015
Saturday, 30 May 2015
वैचारिक विकलांगता
वैचारिक विविधता जब वैचारिक विकलांगता का शक्ल अख्तियार कर लेती है तब मानवता संकट के दौर से गुजरने लगती है|
आत्म विश्वास
कई बार गरीबों को भोजन,आवास,सुविधाएँ देने से ज्यादा जरुरी आत्म विश्वास देना होता है ताकि सब कुछ वे अपने बलबूते हासिल कर सकें|
Tuesday, 24 February 2015
इंतजार
जैसे किताबें घर में रहकर अपने पढने का इंतजार करती हैं वैसे ही मैं पास रहकर इंतजार करता रहता हूँ कि तुम कभी वक्त निकालकर मुझे पढ सको |
Saturday, 14 February 2015
मापदंड
मापदंड पद का नहीं व्यक्ति का होना चाहिए क्योंकि संवेदनशीलता का संबंध पद से नहीं व्यक्ति से है और व्यक्तित्व की गरिमा स्थायी है जबकि पद का वैभव अस्थायी| व्यक्ति संवेदनशील हो तो पद और व्यक्तित्व दोनों एक दूसरे को गौरवान्वित करते हैं अन्यथा व्यक्तित्व की गरिमा के अभाव में पद छूटते ही व्यक्ति की साख खत्म हो जाती है|
प्रेम
नफरत के 364 दिन पर प्रेम का 1 दिवस बहुत भारी होता है और प्रेम अगर खुद के दिल में उतर जाए तो जिंदगी के अँधेरे उजाले में यूँ ही बदल जाते हैं|
Friday, 13 February 2015
Tuesday, 10 February 2015
Saturday, 7 February 2015
Friday, 6 February 2015
दलित का ब्राह्मणवाद
जीतन राम मांझी का यह बयान शर्मनाक कहा जाना चाहिए कि 'दलित की वजह से उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की साजिश हो रही है|' यह जातीय भावनात्मक खेल बड़े पद पर बैठा कोई व्यक्ति खेलता है तो वह भी अपने अहम के आधार पर उसी ब्राह्मणवाद का समर्थन कर रहा होता है जो यह मानता है कि सर्वोच्च पर सिर्फ उसका ही अधिकार है|
राजनीतिक साहस
धार्मिक आधार पर बुखारी का समर्थन मना करने का राजनीतिक साहस आम आदमी पार्टी जैसी छोटी पार्टी कर सकती है पर डेरा सच्चा सौदा का इसी आधार पर समर्थन न लेने साहस भारतीय जनता पार्टी जैसी बड़ी पार्टी क्यों नहीं कर पाती है| जो चुनाव जातीय,वर्गीय एवं स्वार्थपूर्ण गुटबंदी के आधार पर लड़ा जाए उसे निष्पक्ष कैसे कहा जा सकता है?
वैचारिक स्वच्छता
इस बार का दिल्ली चुनाव प्रचार ऐतिहासिक रहा| 70 सीटों वाली छोटी विधानसभा के लिए ताबड़तोड़ प्रचार,महंगे प्रचार माध्यम एवं मीडिया के जरिए ऐसा प्रतीत हुआ कि चुनाव मोदी बरक्स केजरीवाल के बीच न होकर भारत-पाकिस्तान के बीच हो रहा हो| स्वच्छता की दुहाई देने वाले लोग अपने संबोधनों में सारी मर्यादाएं तोड़ते नजर आए| इस देश में स्वच्छता अभियान चलाए जाने से ज्यादा जरुरी है वैचारिक स्वच्छता स्थापित की जाए|
असीम आनंद
असीम आनंद के समंदर में क्रोध,नफरत की नदियां समां जाती हैं एवं क्रोध,नफ़रत के समंदर में असीम आनंद के पल विलुप्त हो जाते हैं|
Monday, 2 February 2015
आंधियां
आँधियों से चिराग बेशक कमजोर हो पर उजाला चिराग से ही होता है,आंधियां ताकतवर कितनी भी हो पर उजाड़ना ही उनका स्वभाव होता है|
Sunday, 1 February 2015
Saturday, 31 January 2015
झूठ का विज्ञापन
भारत सरकार के सर्वोच्च सम्मान से अभिनेताओं/खिलाडियों को तभी सम्मानित किया जाना चाहिए जब वे बाजारवादी विज्ञापनों से परहेज करते हुए सामाजिक योजनाओं का प्रचार-प्रसार करने का लिखित आश्वासन दें| अन्यथा यह ढोंग लगता है कि भारत रत्न/पद्म श्री/पद्म विभूषण से सम्मानित लोग साबुन/तेल आदि के झूठे गुणों का प्रचार कर आम जन की भावनाओं से खेलते हैं| ऐसे लोगों को स्वत: ही बाजारवादी सोच से ऊपर उठ कर जन हितार्थ कार्य करना चाहिए क्योंकि जिस ओहदे पर सम्मान प्राप्त करने वाले अभिनेता/खिलाडी होते हैं वहां धन से ज्यादा सम्मान का मूल्य है|
दिमाग की गंदगी
दिमाग की गंदगी ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक दुर्गंध पैदा कर मानवता को शर्मशार करती है| भावों एवं विचारों की स्वच्छता से ही आत्मविकास व जन कल्याण संभव है|
Wednesday, 28 January 2015
Monday, 26 January 2015
देशभक्त
इंडिया गेट पर खड़े हो जाने से व्यक्ति देशभक्त हो जाए यह जरुरी नहीं, देशभक्त वे हैं जिन्होंने हमें इंडिया गेट पर गर्व के साथ खड़ा होने का साहस एवं नया उजाला दिया|
भारतीय राजनीति
भारतीय राजनीति मन, वचन, कर्म द्वारा विपक्षी नेता एवं दल को निम्नतर साबित करने के लिए भावनात्मक व षड्यंत्रकारी तरीके अपनाने का खेल बन गई है,जिसका एक मात्र उद्देश्य मूल्यों से समझौता करते हुए गलाकाट प्रतियोगिता में स्वयं को जिलाए रखना एवं विरोधी आवाज को कुचलना भर बन कर रह गया है|
Sunday, 25 January 2015
जिसने पाप न किया हो
किसी दल को अछूत की नजर से देखना अपनी दृष्टि का ही दोष है,इसके वनिस्पत दल के चेहरों की परख की जानी चाहिए क्योंकि आज के माहौल में सभी दलों में ऐसे लोग मौजूद हैं जिसके बारे में कहा जा सकता है कि 'जिसने पाप न किया हो,वह पहला पत्थर मारे..'
Saturday, 24 January 2015
ओबामा की आवभगत
देश वह महान और समृद्ध होता है जो अपने आम आदमी को भी विशिष्ट का दर्जा देता है| अन्यथा व्यक्ति विशेष के लिए की गई कवायद हास्यास्पद बन आम आदमी का मजाक उड़ाते दिखती है|
पता नहीं भारत के प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति के स्वागत एवं सुरक्षा के लिए अन्य राष्ट्र कितना अपने स्वाभिमान से समझौता करते हैं ? अतिथि देवो भव: की परंपरा का निर्वाह करते हुए हम अपने आप को इतना दीनहीन क्यों बना लेते हैं,यह भी विचारणीय प्रश्न है| यहाँ यह भी देखना दिलचस्प है कि भारतीय मीडिया विश्लेषण एवं चाटुकारिता का अंतर ही मिटा देता है|
Friday, 23 January 2015
साथ
साथ चलने वाले साथी जब सदा के लिए बिछड़ जाते हैं तब एहसास होता है कि जिंदगी का एक सिरा कहीं कट कर गिर गया है जिसके बगैर ही जीवन का रास्ता तय करना होगा|
दुःख-सुख
जीवन के कुछ दुःख अनहोनी सुख की पटकथा लिख रहे होते हैं, परंतु वक्त के थपेड़ों में पड़कर कुछ दुःख, सुख की अनुभूति से पहले ही दम तोड़ कर जीवन को नया अर्थ भी दे जाते हैं|
Monday, 19 January 2015
सत्ता लोलुप नेता
सत्ताधारी दल से दिल नहीं मिलने वाले नेता कई बार स्व हित में सत्ताधारी दल को लोभवश अपना लेते हैं| ऐसे में सत्ताधारी दल को भी चाहिए कि अपने पुराने सहयोगियों को दरकिनार कर नए चेहरों को ज्यादा तवज्जों न दे| जितना लाभ आयातित नेताओं से नहीं होता उससे ज्यादा भीतरघात से नुकसान हो जाता है एवं कई बार आंकड़ों की जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दों की जीत होती है,जिससे पार्टी व जनता दोनों का भला होता है|
Sunday, 18 January 2015
नायकत्व धर्म
यह दुनिया नायकत्व के बोझ तले दबी हुई है, जो नायक पत्थर से देवता बन उभरते हैं वे पारस नहीं बनते,पत्थरों को देवता नहीं बनने देते| देवता अपने पूजत्व धर्म में सदियों से पत्थरों को कंकड़ में तब्दील करते आए हैं | आत्म प्रशंसा में ग्रंथ के पन्ने रंगते आए हैं| इन नायकों ने नपुंसक सभ्यता एवं आत्म विलीन संस्कृति को जन्म दिया है|यही वजह है कि किसी में नायकत्व की झलक मिलते ही हम पागल हो जाते हैं,उसके अनुयायी बनना ही अपने जीवन का अर्थ समझने लगते हैं|
Friday, 16 January 2015
सामाजिक विकास
सामाजिक विकास का अधिकांश रास्ता राजनीति और सत्ता के गलियारे से गुजर कर स्व- विकास तक सीमित रह जाता है|
अन्ना आन्दोलन के सिपाही
अन्ना आन्दोलन को धार देने की जिन लोगों पर प्रमुख जिम्मेदारी थी वे सभी राजनीति की धार में बहकर देश की जनता के अरमानों को किनारे लगा गए| देखना यह है, कि ये लोग जहाँ हैं वहां वे अपने तात्कालिक लाभ से उबरते हुए कितना अपनी पहचान बना पाते हैं| अन्ना हजारे तो एक मोहरा बनकर रह गए और एक आग जो वक्त की पहचान बन सकती थी वह आग वक्त के पहले ही बुझा दी गई|
Monday, 12 January 2015
विकास बनाम व्यक्ति की राजनीति
जनता भारतीय राजनीति के 'विकास बनाम व्यक्ति' की लड़ाई में व्यक्ति को तवज्जो देती आई है| इस वजह से जनता व्यक्ति के मोह में फंसकर उसे सत्ता व सम्मान तो दिला देती है,परंतु ज्यों ही वह व्यक्ति जनता के मोह से उबरता है हासिए पर चला जाता है| अन्ना हजारे इसके उदाहरण हैं| यह कतई जरुरी नहीं कि किसी भी राजनेता या दल का हर फैसला सही ही हो| सबकी अपनी विषमताएँ एवं विशेषताएं हैं| परंतु जनता का व्यक्तिगत मोह से उबर कर लिया गया हर फैसला सही हो सकता है,अगर वह मीडिया द्वारा प्रायोजित न हो,थोपा हुआ न हो| ऐसे में कोई दल सत्ता में आए विकास के सवालों को केंद्र में रखेगा अन्यथा बहुत बड़े बवंडर से समाज का भला हो यह कोई जरुरी नहीं है|
Thursday, 8 January 2015
पांव तले की दुब
अगर पशु-पक्षी,पेड़-पौधे के भी अपने-अपने देवी-देवता होते और वे अपनी सुविधानुसार अपने-अपने देवी-देवता का उपयोग करते तो इस दुनिया का रंग ही कुछ और होता| पशु-पक्षी अपनी-अपनी बिरादरी के ही दुश्मन होते | आम-आम से दुश्मनी निभा रहा होता| परंतु पशु-पक्षी,पेड़-पौधे सब प्रकृति के देवत्व में जीते हैं,बिना किसी संग्रह की लालसा के दूसरों को देना ही अपने जीवन का मूल्य समझते हैं| शायद इसलिए भी खुशहाल दिखते हैं| काश कि मनुष्य की आँखें भी प्रकृति की ओर खुली होतीं तो वो शिक्षा जो अहम की वजह से किताबों, गोष्ठियों में नहीं मिल पाई उससे बड़ी शिक्षा पांव तले की दुब में मिल जाती|
Monday, 5 January 2015
विचार
विचार आग की तरह होते हैं जिसका विवेकसम्मत व सकारात्मक उपयोग सृजन तथा दृष्टिहीन व नकारात्मक प्रयोग विध्वंस की ओर ले जाता है| विचार ही धर्म, विकास, विज्ञान की आधारशिला है, परंतु जब कुछ सीमित लोग असीमित बल के आधार पर विचार को अपने स्वार्थ की कठपुतली बना लेते हैं तब आमजन को सबसे ज्यादा उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है |
शोषित जन धर्म, विकास एवं विज्ञान के मुद्दे पर सार्थक सवाल उठाने की बजाय मुट्ठी भर लोगों के थोपे गए विचार के आधार पर गुमराह हो जाते हैं | ऐसे में जो जन सार्थक सवाल उठाते हैं उनके सवालों को तंत्र द्वारा या तो दबा दिया जाता है या सवाल उठाने वालों को ही उठा दिया जाता है| संकट इन्हीं सार्थक विचारों को बचाए रखने एवं उस विचार को संजीवनी देने का है जिसके लिए जिगर भी चाहिए और लोभ-लालच से मुक्ति भी| दुर्भाग्य से अधिकांश विचारक लोभ या भय का अंतत: शिकार हो जाते हैं जो कि भावी वक्त के लिए अत्यंत ही खतरनाक है|
Friday, 2 January 2015
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