देश वह महान और समृद्ध होता है जो अपने आम आदमी को भी विशिष्ट का दर्जा देता है| अन्यथा व्यक्ति विशेष के लिए की गई कवायद हास्यास्पद बन आम आदमी का मजाक उड़ाते दिखती है|
पता नहीं भारत के प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति के स्वागत एवं सुरक्षा के लिए अन्य राष्ट्र कितना अपने स्वाभिमान से समझौता करते हैं ? अतिथि देवो भव: की परंपरा का निर्वाह करते हुए हम अपने आप को इतना दीनहीन क्यों बना लेते हैं,यह भी विचारणीय प्रश्न है| यहाँ यह भी देखना दिलचस्प है कि भारतीय मीडिया विश्लेषण एवं चाटुकारिता का अंतर ही मिटा देता है|
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