विचार आग की तरह होते हैं जिसका विवेकसम्मत व सकारात्मक उपयोग सृजन तथा दृष्टिहीन व नकारात्मक प्रयोग विध्वंस की ओर ले जाता है| विचार ही धर्म, विकास, विज्ञान की आधारशिला है, परंतु जब कुछ सीमित लोग असीमित बल के आधार पर विचार को अपने स्वार्थ की कठपुतली बना लेते हैं तब आमजन को सबसे ज्यादा उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है |
शोषित जन धर्म, विकास एवं विज्ञान के मुद्दे पर सार्थक सवाल उठाने की बजाय मुट्ठी भर लोगों के थोपे गए विचार के आधार पर गुमराह हो जाते हैं | ऐसे में जो जन सार्थक सवाल उठाते हैं उनके सवालों को तंत्र द्वारा या तो दबा दिया जाता है या सवाल उठाने वालों को ही उठा दिया जाता है| संकट इन्हीं सार्थक विचारों को बचाए रखने एवं उस विचार को संजीवनी देने का है जिसके लिए जिगर भी चाहिए और लोभ-लालच से मुक्ति भी| दुर्भाग्य से अधिकांश विचारक लोभ या भय का अंतत: शिकार हो जाते हैं जो कि भावी वक्त के लिए अत्यंत ही खतरनाक है|
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