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Thursday, 8 January 2015

पांव तले की दुब

अगर पशु-पक्षी,पेड़-पौधे के भी अपने-अपने  देवी-देवता होते और वे अपनी सुविधानुसार अपने-अपने देवी-देवता का उपयोग करते तो इस दुनिया का रंग ही कुछ और होता| पशु-पक्षी अपनी-अपनी  बिरादरी के ही दुश्मन होते | आम-आम से दुश्मनी निभा रहा होता| परंतु पशु-पक्षी,पेड़-पौधे सब प्रकृति के देवत्व में जीते हैं,बिना किसी संग्रह की लालसा के दूसरों को देना ही अपने जीवन का मूल्य समझते हैं| शायद इसलिए भी खुशहाल दिखते हैं| काश कि मनुष्य की आँखें भी प्रकृति की ओर खुली होतीं तो वो शिक्षा जो अहम की वजह से किताबों, गोष्ठियों  में नहीं मिल पाई उससे बड़ी शिक्षा पांव तले की दुब में मिल जाती|

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