जनता भारतीय राजनीति के 'विकास बनाम व्यक्ति' की लड़ाई में व्यक्ति को तवज्जो देती आई है| इस वजह से जनता व्यक्ति के मोह में फंसकर उसे सत्ता व सम्मान तो दिला देती है,परंतु ज्यों ही वह व्यक्ति जनता के मोह से उबरता है हासिए पर चला जाता है| अन्ना हजारे इसके उदाहरण हैं| यह कतई जरुरी नहीं कि किसी भी राजनेता या दल का हर फैसला सही ही हो| सबकी अपनी विषमताएँ एवं विशेषताएं हैं| परंतु जनता का व्यक्तिगत मोह से उबर कर लिया गया हर फैसला सही हो सकता है,अगर वह मीडिया द्वारा प्रायोजित न हो,थोपा हुआ न हो| ऐसे में कोई दल सत्ता में आए विकास के सवालों को केंद्र में रखेगा अन्यथा बहुत बड़े बवंडर से समाज का भला हो यह कोई जरुरी नहीं है|
No comments:
Post a Comment