जब लेखन प्रेमचंद सरीखे रचनाकारों की तरह किसी खास और बड़े मकसद के लिए छोटे से छोटे लोगों की जीवन शैली को केंद्रित करके चलता है तभी अमरत्व को प्राप्त होता है और लेखक बड़े मुद्दों के साथ जीते हुए बड़ा और सार्थक बन पाते हैं अन्यथा चाटुकारिता पूर्ण एवं एक-दूसरे की बैशाखी के साथ गुमराह लेखन गिरोह का शिकार बन कुंए के पानी सा ठहराव उत्पन्न करता है जिससे शायद ही जनमानस का गला तर हो| हिंदी में आजकल ड्राइंग रूम वाले ऐसे कवि, आलोचक, लेखक सक्रिय हो गए हैं जो आपस में एक-दूसरे की पूंछ पकड़ कर जी रहे हैं और पुरुस्कार का तमगा भी पाने में कामयाब हो रहे हैं| ऐसे लेखक को हिंदी का अभिशप्त लेखक कहा जा सकता है|
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