कुशल,संवेदनशील एवं दूरदर्शी नेतृत्व की कमी प्रशासन,राजनीति की खामी के रूप में उभर रही है| एक तपा एवं दर्द से गुजरा हुआ समाज द्वेष की चिंगारी मात्र से दो खेमों में बंट जाता है| अपार संभावनाओं से भरी सामाजिक दृष्टि व सोच राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छा शक्ति के अभाव में संकुचित होने लगती है| भटकी हुई विचारधाराओं के तले मानवता बौनी होती जाती है| हजारों वर्षों के प्रेम पर पल भर की नादानी भारी पड़ने लगती है| जाने-अनजाने आम जनता इस बहसीपन का शिकार हो जाती है और गुनाहगार जिंदा रह जाता है हम सब में| मुमकिन है शांति पर वह अशांत है हमारे मन में|
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