कई बार आर्थिक सम्पन्नता के वाबजूद मानसिक विपन्नता नहीं जाती और कई बार आर्थिक विपन्नता के वाबजूद मानसिक सम्पन्नता आ जाती है।
मानसिक सम्पन्नता आर्थिक सम्पन्नता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण व मूल्यवान है और मानसिक सम्पन्नता मानव धर्म का पर्याय भी है जिसके लिए हृदय की उदारता व प्रेम अनिवार्य है।
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