Translate

Saturday, 2 August 2014

हिंदी के समसामयिक प्रश्नों से बेखबर

दिल्ली में हिंदी के समसामयिक प्रश्नों से बेखबर छपास व प्रसिद्धि रोग से पीड़ित कुछ हिंदी कवियों, रचनाकारों, आलोचकों व बुद्धिजीवियों की ऐसी जमात है जो वक्त से इतर अर्थहीन व मृतपाय कविताओं, रचनाओं व आलोचनाओं की अर्थी सजाने एवं एक दूसरे की मरी हुई भावनाओं को जिंदा व ताजा बनाए रखने के लिए एक सभा से दूसरी सभा भागते रहते हैं| जो आसपास के दुर्गंध, सड़ी-गली व्यवस्था व हिंदी के लिए चलाए जा रहे आंदोलन आदि से वास्ता न रखते हुए काल्पनिक दुनिया में स्वयं को महफूज रखे हुए हैं| स्वयं के लेखन को अमरत्व देने के लिए नाख़ून भी नहीं शहीद करने वाले लेखकों, कवियों, आलोचकों, बुद्धिजीवियों को न समय माफ़ करेगा न याद रखेगा|   

No comments:

Post a Comment