सत्ता की निगाह में हिंदी एवं हिंदी भाषियों की छवि पहले जैसी थी आज भी वैसी ही है| भ्रम में हिंदी क्षेत्र के लोग हैं जिन्होंने हिंदी की ताकत से ही बीजेपी को बहुमत की सत्ता दिलाई है| हिंदी की अहमियत आज भी कविता,कहानी,मनोरंजन से ऊपर नहीं आंकीं जाती इसलिए दिल्ली के हिंदी आंदोलन के प्रति सत्ता एवं अंग्रेजियत मानसिकता की प्रतिक्रिया एक सी ही है| अगर यह आंदोलन यूपीएससी तक सिमट गया तो हिंदी की जो आग पैदा हुई है वो राख बनते देर नहीं लगेगी| इस आंदोलन का सबसे बुरा पक्ष हिंदी के मठाधीशों का इस आंदोलन से दूरी है जो यह दर्शाता है कि हिंदी ने जिन्हें कद दिया है वे भी हिंदी को कमतर ही आंकते हैं|
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