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Saturday, 19 July 2014

कविता का कंठ खोना

कविता आत्म सौंदर्य का प्रस्फुटन है,जो धर्म,संस्कार की सीमा से परे एक अलौकिक सत्य है| कविता सामाजिक व सांस्कृतिक सत्य को उजागर करने का एक कारगर हथियार है जिसमें सोयी हुई सत्ता एवं आम जन को जगाने की अपार शक्ति है,परंतु जब से कविता राजनीतिक हो गई है अपना कंठ खो बैठी है| 

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