आजादी से लेकर अब तक हिंदी के बारे में अधिकांश शीर्ष स्तर के सरकारी, राजनीतिक, बुद्धिजीवी, जिम्मेदार व प्रभावशाली लोगों के वक्तव्य व संदेश का मूल भाव समय-समाज के तर्क एवं यथार्थ से दूर हिंदी के दिवास्वप्न से जुड़ी आशा एवं हिंदी भाषा के पारंपरिक भावना से प्रेरित है| शायद इसलिए भी हिंदी सशक्त होने के बावजूद साजिश के तहत याचना की भाषा एवं वर्ष में एक बार स्मृति की भाषा में तब्दील होती जा रही है,जो कि गहरी चिंता व विमर्श का विषय है|
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