जैसे ही आप किसी दल,संगठन,संस्थान आदि की सीमाओं से बंधते हैं: आप उस दल, संगठन, संस्थान के पिंजड़े का तोता बन जाते हैं| सही को सही और गलत को गलत कहने की आपकी विवेकशीलता पर उस दल,संगठन,संस्थान का शिकंजा इतना कसा होता है कि आप पिंजड़ा धर्म निभाने के लिए हर गलत काम को न्यायोचित सिद्ध करने में अपनी नैसर्गिक प्रतिभा का हनन करने लगते हैं एवं उस दल,संगठन,संस्थान को बनाने में खुद अपना नैतिक पतन कर लेते हैं और वही दल,संगठन,संस्थान कई बार आपको मक्खी की तरह निकालकर बाहर भी फेंक देता है| ऐसे में आत्म धर्म ही आपका संबल बनता है|
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