कई बार सम्मान अपनी सार्थकता खो बैठता है| अटल बिहारी बाजपेयी जी को यह सम्मान अगर बीमार होने से पहले मिलता तो उनके लिए सार्थक था| ऐसे ही अन्य महापुरुषों को यह सम्मान उनके जीते जी मिलता तो उनके लिए गौरव की बात होती| अक्सर देखा जाता है व्यक्ति तो गुमनामी में मर जाता है पर बाद में वह सम्मान का हक़दार हो जाता है या उसके नाम पर ही सम्मान चल पड़ता है| यह ऐसे ही है जैसे मीडिया के कुछ लोग बाढ़ में डूब रहे लोगों से पूछते हैं कि कैसा लग रहा है? शायद इसलिए भी भारतीय राजनीति में दो परंपराएँ चल पड़ी है एक खुद ही स्मारक बनाने की; दूसरी अपने लोगों को स्वयं ही महिमामंडित करने की,चाहे उसकी जन स्वीकार्यता हो या नहीं क्या फर्क पड़ता है? किंतु कुछ ऐसे भी ज्ञानी हैं जिन्हें कहीं से सम्मान मिल जाए तुरंत ले लें परंतु बड़े से बड़े लोगों के सम्मान पर भी ऊँगली उठाने से परहेज नहीं करते| सम्मान मिलने से ज्यादा महत्वपूर्ण है यह देखना कि सम्मान देने की पीछे की भावना क्या है? पर यह देखने की फुर्सत किसे है? यहाँ तो लोगों को एक ही गम है-- तुम किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी?
No comments:
Post a Comment