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Thursday, 4 December 2014

भाषा की कठोरता का सवाल

वर्तमान समय-समाज में व्यक्ति पर सामाजिक विडंबनाओं व प्रतिस्पर्धा का इस कदर मानसिक दबाव है कि व्यक्ति के मन की भाषा और स्वार्थ की भाषा में भारी अंतर आ गया है जिसके कारण अधिकांश राजनीतिज्ञ,बुद्धिजीवी,प्रशासक,बाबा सभी दोहरे चरित्र का शिकार हो गए हैं| भाषा की कठोरता स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व के कठोरता की ही उपज है जो दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति को भी रेखांकित करती है| ऐसे में जीवन को सुगम व चिंतन को सकारात्मक बनाने की जरुरत है क्योंकि अहम,दुर्भावना से जुड़ी  भाषा हिंसक भाषा में तब्दील हो असभ्य समाज का निर्माण कर रही है,जिसका परिणाम अंततः विनाशकारी है| 

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