कुछ चींजे कहने की होती है और कुछ करने की| दुर्भाग्य है कि राजनीतिक स्तर पर, संचार के स्तर पर, प्रशासनिक स्तर पर यहाँ तक कि व्यक्तिगत संबंध के स्तर पर हम कहते कुछ हैं करते कुछ हैं और देश-दुनिया-समाज में अनावश्यक ही अपनी भद्द पिटवा कर अपनी साख मिट्टी में मिलवा लेते हैं|
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