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Wednesday, 6 January 2016

संक्रामक राजनीति का दौर

संक्रामक रोग की तरह राजनीतिक मुद्दे भी संक्रामक हो गए हैं| कुछ दिन की हायतौबा फिर टायं-टायं फिस| सुरक्षा,शिक्षा,स्वास्थ्य जैसे अहम मसलों पर भी कोई सर्वसहमत दीर्घकालिक योजना नहीं,दूरगामी सोच नहीं| एक-दूसरे पर आरोप्र-प्रत्यारोप से देश का सुदृढ़ विकास करने का खांका मीडिया के सहारे खींचा जा रहा है| समझ में नहीं आता कि देश की दशा-दिशा सरकार तय कर रही है या मीडिया| मान-अपमान,भाषा की गिरावट, बेशर्मी, अपराधीकरण राजनीति की पहचान बनती जा रही है और जनता आसमान में सपने बुन रही है|

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